कितना होता है बचपन का साथ.

कितना होता है बचपन का साथ.

छोटी कहानी (मौलिक व स्वरचित )

कितना होता है बचपन का साथ….

बचपन का साथ कितना चलता है?

आभा और रीता  बचपन के साथी रात -दिन गांव में साथी थे साथ ही रहते, पढ़ते और स्कूल जाते थे. एक दीवाल ही तो थी दोनों के घर के बीच नहीं मिल पाते तो छत पर चले जाते.

खेल -कूद,लड़ना -झगड़ना सब साथ चलता. कभी मम्मी कहती तो दौड़ते जाकर दुकान से फली दाने और शक़्कर लाते. काम एक का होता पर जाते दोनों साथ थे इतना साथ था.

ज़ब आठवीं की पढ़ाई  के लिए आभा शहर चली गईं तो रीता कितना सुबक -सुबक कर रोई थी पर आभा बोली थी रो मत रीता!मै हर छुट्टी में मिलने आउंगी फिर हम पहले की तरह खूब मस्ती करेंगे.

रीता ने आंसू पोंछे और मुस्करा कर आभा से बोली थी -हाँ!मै अब नहीं रोती तू जा मेरी चिंता मत कर. वंहा अच्छे मन लगा कर पढ़ाई करियो. फिर आना छुट्टी में… हम खेलेंगे.

आभा भी डबडबाई आँखों से देखते गईं थी इस तरह से वो बचपन का साथ छूट गया था. फिर मेले के दिनों में आभा आई तो दोनों हाथ पकड़ कर मेले गईं थी साथ में दर्शन कर घाट पर बैठकर कुल्फी खाई थी घर आकर पापा के लाये आम दोनों ने छत पर रात तक चूसे थे. बीच में रीता आभा से पूछती शहर के स्कूल के बारे में तो आभा बताते जाती.

दूसरी बार आभा शहर गईं तो रीता उतना नहीं रोई थी उदास हुईं पर अगले दिन से अपनी क्लास में लग गईं थी. बचपन के खिलौने अब उसने दूसरी लड़कियों को दे दी थी ताकि आभा की याद न आये.

बस इधर आभा भी अपनी पढ़ाई और नई सहेलियों में मस्त हो गईं अब साल में दो बार ही आती थी. गांव में आभा की दादी भी गुजर गईं तो उनके घर पर ताला लग गया तब रीता अब उस ओर  ज्यादा नहीं देखती और आभा को भूल जाने की कोशिश करती.

फिर ग्यारहवीं होते ही बचपन ने विदा ली आभा अपने प्री टेस्ट में बिजी रही और रीता का ब्याह भी हो गया. अब आभा कभी पूजा में आई तो रीता वंहा नहीं थी वो ससुराल में थी आभा का मन नहीं लगा फिर गांव में तो उसने गांव आना बंद कर दिया कारण अब रीता तो वंहा नहीं होती थी.

दिन, महीने साल सब गुजरते गए रीता के दो बच्चे हो गए ये आभा को पता चला. इधर आभा भी डॉक्टर हो गईं. अब मिलना नहीं होता कभी पता चलता तो हालचाल जान लेते एक दूसरे का.

एक दिन आभा को पता चला कि रीता भी इसी शहर में आ गईं है बच्चों को पढ़ाने. लेकिन पता चलने पर भी दोनों नहीं मिल पाई बस जानती है कि दोनों एक ही शहर में रहती है पर किधर पता नहीं.

शायद दोनों जानती है कि मिलकर भी अब दोनों बचपन की तरह बाजार दौड़ते हुए नहीं जायेगी या घाट पर बैठकर पाँव लटकाकर बैठकर पैर  हिलाते हुए कुल्फी नहीं खा पायेगी.

बचपन की इन्हीं यादों को दिल में सहेज वो दोनों नहीं मिल पाई व्यस्त होने के कई बहाने थे क्योंकि बचपन का जो साथ था वो तो तब ही था ज़ब बचपन था अब बचपन नहीं है तो उन यादों को क्यों बदले शायद यंही सोचकर एक शहर में होकर भी दोनों नहीं मिलती.

लेखिका -जोगेश्वरी सधीर

मोबाइल -9399896654

कॉपी राइट @जोगेश्वरी सधीर 


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