गेंहू की रैली (कहानी )

गेंहू की रैली (कहानी )

गेंहू की रैली (कहानी )

रामू को शहर देखने का बड़ा शौक था पर वो नहीं जा पा रहा था. उसका अपना कोई नहीं था वंहा. पर शहर को वो अपने मालिक के घर टीवी मे देखकर सोचता कि वंहा बड़ा सुख होता होगा. 

यंही सब कल्पना वो अपने काम करते वक़्त करता रहता था. सबको उसके शहर जाने के अरमान के बारे मे पता था. उसकी विधवा माँ हमेशा भयभीत रहती कि कंही रामू किसी के साथ शहर न चले जाये. 

आखिर वो दिन आ ही गया. गांव मे कड़ाके की ठंड पड़ रही थी और शाम के वक़्त एक खटारा टेम्पो बाहर तरफ खड़ी थी. पप्पू जो बहुत बदमाश गुंडा था तथा नेता जी का खास था उसे देख बोला -अरे !रामू !चल नहीं रहा. लखनऊ? 

रामू ने बेबस नज़रों से देखा था उसे कि कैसे जाऊंगा? तब हाथ की बीड़ी को पैरों से मसल कर पप्पू बोला -सोचता क्या है अभी चल टेम्पो जा रहा है. 

रामू ने सोचा माँ को बताऊंगा तो जा नहीं सकूँगा. इसलिए वो जिस हालत मे था उसी हालत मे टेम्पो मे बैठ गया तो उसके नथुनों मे अजीब सी गंध भर गई. दरअसल वो सभी देशी चढ़ाये हुए थे. रामू को अच्छा नहीं लगा तो वो उतरने को हुआ लेकिन तब तक टेम्पो धुंआ छोड़कर बढ़ चूका था. पप्पू ने उसे कंधे से पकड़ कर रोक लिया और बोला -अबे !मरजाने !कंहा चलती गाड़ी से कूद रहा है? 

रामू का मन बिलख गया. जाने क्यों उसे लगा वो अब कभी गांव नहीं लौटेगा और वो जैसे चलती टेम्पो से कूदने को मचल उठा. तब पप्पू ने उसे कमर से जोर से पकड़ लिया और उसे इधर -उधर बुरी तरह से दबोचने लगा. फिर जाने क्या सुंघा दिया कि रामू होश खो बैठा. 

जब रामू को होश आया तो उसने अपने को बदबूदार कमरे मे जकड़े हुए पाया. वो औंधा एक खाट पर बिना कपड़ो के बँधा था. उसे लगा उसके पीछे खून बिखरा और चिपचिपा सा ढेर सा. 

रामू ने खुद को जितना आज़ाद करना चाहा उतना ही उसे कुछ मुस्टंडे गुंडों ने पकड़ कर रौंद दिया और वो फिर बेहोश हो गया कारण उसे कुछ सुंघा दिया गया था. 

रामू से वे छुटभैये नेता बने लड़के घिनौना काम करते रहें और जब उसकी जान निकल गई तो उसे नदी मे फ़ेंक दिया मगरमच्छों के सामने. 

शहर के शौक ने एक मासूम पितृ -विहीन लड़के की बुरी तरह जान ले ली. 

गांव मे आज भी उसकी माँ सड़क पर खड़े होकर सबसे पूछ रही है -अरे भैया !मेरे रामू को देखा क्या? बड़ा सुन्दर है हीरो जैसे कपड़े पहनता है. 

तब वंही पप्पू कहता है -भाइयों !ये बुढ़िया ना पागल हो गई है. इसकी मत सुनो. 

और अपनी टेम्पो का धुंवा उस दुखियारी माँ पर छोड़कर आगे बढ़ जाता है. 

लेखिका जोगेश्वरी सधीर बालाघाट mp 


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