स्कूल के दिनों की यादें

ज़ब शाम से डर लगता था…

आज बौद्ध विहार से ध्यान करके लौट रही थी बेटे के साथ तो मुझे ढलती शाम में वैसा भय नहीं महसूस हुआ जैसे पहले असुरक्षा महसूस होती थी शाम से डर लगता था नहीं पता क्यों ढलती हुई शाम मुझे डराती थी और एकाकीपन महसूस होता था शायद मेरे पति को भी इतना ही अकेला लगता रहा हो क्योंकि हम साथ होकर भी साथ नहीं थे और जीवन में तब इंसान अकेले हो जाता है ज़ब वो भावनात्मक रूप से एकाकी हो. अब ऐसा कोई डर मेरे मन में नहीं लग रहा है मै इस जगह पर अच्छा और सुरक्षित महसूस कर रही हूँ.

कॉपी राइट @jogeshwarisadhir


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