Paarijat novel

पारिजात (भाग -1)

पारिजात (भाग -1)

(पूर्व लिखित नॉवेल जंवा -कुसुम से आगे की कहानी )

Written by Jogeshwari Sadhir Sahu

एक

शहर का यह घर गांव जितना बड़ा तो न था किन्तु इंदु ने इस बात का पूरा ख्याल रखा था कि घर के कमरे बरामदे, सहन विस्तृत हो उनमें एक भाव पैदा हो सके. चहारदीवारी से घिरे आंगन में मधु -मालती की बेल खूब छितर गईं थी, जो जरा से मंद समीर के झोंके में बांकपन से लहरा उठती थी. घर फिर भी बड़ा ही था. मुख्य -कक्ष के बगल में सहायक -कक्ष था यह एक पृथक भाग था. किन्तु उन दोनों ही भागों का बरामदा एक था. इंदु का सारा वक़्त अपने घर के आँगन के पेड़ों व लतरों को संवांरने में लगता था.

कोई भी तो ध्येय नहीं था एक निरुद्देश्य जीवन का सिवाय इसके कि अपने बेटे सोनू की देखभाल करें. वह अपने बेटे अजय को सोनू ही कहती थी.

सोनू बेहद एकांगी सा जीवन जी रहा था. कॉलेज जाता वंहा से आता तो अपनी किताबों में खो जाता. ऊँचा -पूरा बांका सा जवान किन्तु एक नीरस जिंदगी में पूरी तरह तंहा यह 21 बरस का लड़का बस माँ को ही सबकुछ मानता था.

इंदु को यंही पता नहीं चलता था कि वो सोच क्या रहा है इंदु के लिए भी तो इस संसार में कोई साधन नहीं था. सिवाय इस बेटे के. हरदम उसके साथ रहती हरदम उसकी परवाह करती यंही उसका काम था.

अजय बढ़ते कद का चन्द्रमा की तरह खूबसूरत व धीर-गंभीर स्वभाव का था. उसमें जो आकर्षण था वो उसकी गंभीरता का होता हालांकि उसका शरारीक सौष्ठव उतना नहीं उभरा था वो एक तरह से दुबला ही था. वैसा गठिलापन नहीं आया था जो शरारीक मेहनत से युवाओं के आता है. काफ़ी लम्बा व दुबला अजय पहली नज़र में ही देखने वालों की नज़र को अपनी ओर खिंचता था. मुख्यकृति उसकी सौम्य थी वंही मीठी सी मुस्कान उसके चेहरे पर फ़ौरन आ जाती यदि किसी से भी उसकी नज़र मिलती तो वो मुस्करा देता. हालांकि वो कभी भी कुछ बोल नहीं पाता था.

उस दिन भी वो रसोई तैयार कर अजय की प्रतीक्षा कर रही थी कि वो कॉलेज में आएगा तो दोनों भोजन करेंगे. कुछ देर बाद गेट खुलने की आवाज आई तो इंदु ने उठकर देखा अजय ही था.

आजय ने भीतर आकर अपनी शर्ट उतारी और वो बाथरूम में हाथ -मुंह धोने चला गया. लौटा तो चेहरा पोंछते हुए इंदु के पास आकर लेट गया. इंदु पलंग पर बैठे उसे देख ही रही थी.

इंदु -क्यों क्या बात है सब ठीक है?

अजय ने हूँ कहा कुछ बोला नहीं.

इंदु उठकर खाना लगाने को उद्धत हुई हुई तो वो बोला –

आप खा लो..

क्यों?..

इंदु ने देखा उसके चेहरे पर तनाव स्पष्ट दिख रहा था. जाने क्या हो जाता उसे कि वो अपने आप से लड़ता दिखता अक्सर वो अपने आप से लड़ता दिखता.

इंदु जो बेटे को इंतहा चाहती थी अतः वो ये कल्पना भी नहीं कर सकती थी कि उसका बेटा उसी से नाराज़ है. अजय के नहीं खाने से उस दोपहर वो भी भूखी बैठी रही. कुछ देर टीवी देखा फिर कुछ धार्मिक ग्रंथो का पारायण करने लगी. अजय की ऑंखें लेटे -लेटे ही लाल हो गईं वो जाने किन -किन विचारों में खोया रहा.

इंदु को लगा उससे उससे ऐसी क्या त्रुटि हो गईं जो उसका बेटा उससे नाराज रहने लगा है. उसने अजय के कपड़े ज़माये जंहा -तंहा बिखरा सामान समेटा और उसे बाहर चलने कहा ताकि उसका मन लगे. अजय ने आखिर भोजन किया.

इंदु भी अपनी ही धुन में मग्न रहने वाली औरत थी इतनी हठिली की दृष्टि पसार कर इधर -उधर देखती तक नहीं थी. अजय के संग जयपुर घूमने गईं तब भी उसका ध्यान न तो बाजार में लगा न ही किसी प्रकार के गहने -कपड़े खरीदने में अलबत्ता वह अजय के लिए कपड़े जरूर खरीदती रही. जयपुर के राजसी ठाट से भरे बाजार को देखकर यंही सोचते रही कि वो यंही से अजय की दुल्हन के लिए गहने -साड़ियां खरीदेगी.इंदु की भी क्या जिंदगी थी? पति जिससे एक पल भी निभा नहीं सकी उसीकी विवाहिता के रूप में जी रही थी.

जिस पति त्रिलोक से उसका कभी कोई तालमेल नहीं बन सका कोई तादातम्य नहीं रहा उसी से वो जीवन जीने का साधन पा रही थी. क्योंकि वो उसकी जायज पत्नी थी और इसी नाते उसे सब साधन जीने के मिले थे जिन्हें पाने दुनिया की कोई भी स्त्री रात -दिन परिश्रम करती.

इंदु ने पति से तलाक नहीं लिया न ये बात दिमाग़ में आई कारण? विवाह के बाद स्त्री का जीवन उसके पति का घर होता है. यंही रीति उस समय के हिन्दू समाज में थी इसलिए पिता के घर के घर में आश्रय लेने का सवाल ही नहीं उठता था.

इस विचित्र से बंधन को निभाने वाली वंही अकेली स्त्री थी ऐसा नहीं था. किन्तु यह सच था कि इंदु की तरह दुविधा में जीने वाली भी शायद कोई स्त्री नहीं थी. ज्यादातर ऐसे मामलों में पति -गृह का त्याग ही करती थी. किन्तु इंदु मंदमति होने के कारण वह त्याग नहीं कर सकी. अनचाहे रिश्ते के बीच दबी तो रही किन्तु अपनी निजता को बचाते हुए.

यंही त्रिलोक उसे अछूत रखकर बाहर जीने की मृगतृष्णा में दुनिया भर में भटकता रहा. बाहरी जीवन और औरतों का चस्का ही ऐसा रहा कि वो कभी भी अपनी हठी पत्नी के पास नहीं फटका जो ना तो उसे चाह सकी ना ही उसने फिर उसे छलने वाले राज को ही ही पाने का कोई यत्न किया जिसके लिए कभी वो पागलों की तरह उसके नगर ब्यावर तक चली गईं थी.

दो

यूँ तो राजगढ़ से ब्यावर की दूरी 60-70किलोमीटर ही थी किन्तु इंदु जंहा रहने आई थी विदिशा से ब्यावर 150किलोमीटर दूर था.

वह तब विदिशा में आई थी दो बरस गुजर चुके थे अपने गांव वाले घर से निकले हुए फिर वो वंहा लौट कर नहीं गईं थी.त्रिलोक ने गांव में कैसे रखा था इससे उसे कोई सरोकार नहीं था. यंही उन दोनों के बीच का अलिखित समझौता था कि त्रिलोक जिसे चाहे रखें इंदु घर में अपनी निजता के साथ रहेगी. यदि इंदु राज शेखर के साथ कोई सम्पर्क नहीं करेंगी तो त्रिलोक भी उसे कोई त्रास नहीं देगा.

इंदु को उन्हीं दिनों हेमलता मिल गईं थी जो उसके पड़ोस में रहने आई थी. हेमा का पति ठेकेदारी करता था उनका मकान बन रहा था कुछ वक़्त के लिए वो पड़ोस में रहने आये थे. तभी इंदु की कुछ देर के लिए बातें हो जाती थी. हेमा यूँ ही कुछ देर को इंदु के यंहा आई थी और जाने कैसे उसके मुख से निकल गया था कि वो ब्यावर के पास के रहने वाले है.इंदु का तो जैसे रक्त ही जम गया था उसने चेहरे के भावों को यत्न से छिपा कर कुछ नहीं कहा.हेमा स्वतः ही राज शेखर की बात बताती रही कि वो ऐसे है वो वैसे है आदि.

हेमा के घर के निर्माण के पश्चात ज़ब वास्तु हुआ तो इंदु काफ़ी देर से वंहा पहुंची सभी आगनंतुक जा चुके थे. इंदु ने काफ़ी सादी साड़ी पहन रखी थी उसके गले में एक मात्र मंगल सूत्र ही था. वह यूँ ही वंहा पहुंची थी कि उसका सामना राज शेखर से हो गया.हेमा ने तब हँसते हुए परिचय कराया था -ये है हमारे प्रिय शेखर जी!

इंदु को हेमा की ये हरकत बेहयाई सी लगी थी. वो चुपचाप एक कोने में समा गईं थी. इंदु का गेहूंआ रंग दब सा गया था वह तब राज शेखर को चिंता मग्न और बेचैन सी लगी थी.

देह तो उसकी वैसी ही थी खरे सोने जैसी दमकती और लचिली दृष्टि वैसी ही सीधी और बेंधने वाली मानो कोई सवाल कर रही हो. राज शेखर ने तब उसे ठुकरा कर यूँ कहे अपमानित कर भलमनसाहत जताई थी पर आज राज पराजित सा लगा था.

इंदु ने यूँ ही पूछ लिया था आपकी पत्नी कैसी है?

राज शेखर जिसे हम आगे राज ही कहेंगे की ऑंखें सिकुड़ गईं व छलछला आई. इंदु को उसकी भावना समझ नहीं आ रही थी या यूँ कहे नौटंकी.

राज ने कहा -दो माह हुए वो गुजर गईं.

ओह!” इंदु को एकाएक सुझा नहीं कि वो क्या कहे. किन्तु राज के दुख से वो द्रवित सी हो गईं. अतः दुखी ह्रदय को संत्वना देने उसने राज की ओर प्रेम से देखा वो क्या कर सकती थी.

फिर वो उठकर हेमा से इजाजत लेकर घर लौटने को उद्धत हुई तो राज ने कहा वह उसे घर छोड़ देता है. बेटा घर में पढ़ रहा था अजय उस वक़्त फर्स्ट ईयर की तैयारी कर रहा था. राज कुछ देर तक बैठा और चले गया. इंदु ने उससे उसके बेटे के बारे में पूछा.

राज बोला -ब्यावर के घर में अकेला हूँ. सब शहर में रहते है कभी आ सको तो आओ. कुछ दिन यूँ लगेगा मानो किरण आ गईं है.

किरण राज की स्वर्गीय पत्नी का नाम था.इंदु वह पहली स्त्री थी जो राज के जीवन में आई थी और भी औरतें थी पर इंदु के संग संबंधों के चलते तब राज का विवाह आनन -फानन में कर दिया गया था.

इंदु का मन पिघल गया था. वो एक बार फिर से raj🙏के इर्द -गिर्द सोचने लगी थी. अजय अपनी स्टडी में व्यस्त था पर माँ पर उसका पूरा ध्यान रहता था. इंदु को नहीं पता था कि अजय उसे अक्सर कँखियों से देखा करता था कि इंदु के मनोभाव क्या है वो कब किसके बारे में सोच रही है ये टोह अजय चुपके से लेता रहता था.

शायद अजय को ये कभी सहन नहीं हुआ था कि इंदु राज शेखर नामक पर -पुरुष को चाहे. वो अब व्यस्क हो चुका था एक पुरुष ही था उसे यंही अपेक्षा थी कि उसकी माँ इंदु के जीवन में वंही एक शख्स है जो कि उसका बेटा है.

राज शेखर के आने से अजय मन ही मन बहुत शर्मिंदा महसूस कर रहा था उस पर इंदु उससे राज की बात इस आशय से कर रही थी कि वह अपने बेटे से इस शख्स के बारे में कुछ छिपाना नहीं चाहती किन्तु ये उसकी कितनी बड़ी भूल होने जा रही थी ये उस मूढ़मति को नहीं पता था.

एक बेहद पवित्र और एकाकी जीवन जीने वाली इंदु का यौवन अक्षत व कुंवारा लगता था. उसकी देह 21-22बरस की युवती जैसी सधी हुई थी. वंही अछूता अहसास उसके भीतर था जिसे देख विधुर राज शेखर का मन उसे पुनः पाने को लालायित हो उठा.

राज ने पहले भी इंदु को जितना चाहा भोगा था और बदनाम होने पर बिन बताये मँझधार में छोड़कर चल दिया था तब इंदु ने जो बदनामी और अकेलापन झेला था उसकी कोई सीमा नहीं थी. इंदु को अंतिम बार वो विरह -दग्ध अवस्था में छोड़कर ज़ब भागा था तब बहुत ही अपमानजनक हालत उत्पन्न हो गए थे. तब वो इतना अहमक और अलमस्त हो गया था कि इंदु को ढंग से गले लगाना भी जरूरी नहीं समझा था यूँ कहे वो इंदु को ठोकर मारकर अपमानित करके गया था. उसने इंदु से गलत तरिके से उसकी बहन की मांग की थी. जिसे इंदु ने रोते हुए अस्वीकार कर दिया था.

तब उसे इंदु के दिल तोड़ने में जरा भी झिझक नहीं हुई थी. राज को इंदु के मान -सम्मान की तनिक भी परवाह नहीं थी और वो एक अय्याशी करने वाला नीचे गिरा धूर्त शख्स था तब इंदु उससे आकर लिपट गईं थी तो उसे उसकी पवित्र देह से खेलने और वासना-पूर्ति में एक पल की देरी नहीं लगी थी. यंही उसका स्वभाव था. अपने सममोहन में आने वाली स्त्री को फाँसो वासना-पूर्ति करो और चुपके से भाग जाओ. वो यंही समझता था जंहा भी कोई औरत या लड़की मिले उसका भोग करने का उसका जन्मसिद्ध अधिकार है.

इंदु का ये पागलपन था कि वो उस जैसे लम्पट के प्रेम में पागल हुई थी जो खुद को कृष्ण-कन्हैया समझता था. तब उसने निर्लज्जता से इंदु से उसकी ही अक्षत -यौवना बहन शालिनी की मांग की थी. अपने इन्हीं नीच कृत्यों का फल भुगत रहा था राज उसका मंत्री -पद छीन चुका था उसका सारा परिवार उससे दूर शहर में रह रहा था. ब्यावर की हवेली में वो अकेला रहता था आती -जाती तो बस उसकी वो चाहने वालियां थी जिन्हें उसने अय्याशी करने फान्स रखा था.

अपनी जमींदारी व राजनीतिक स्टेटस का फायदा उठा कर उसने जाने कितनी युवतियों का मान-भंग किया था उसके इसी रौब पर अपना सर्वस्व नयौछावर करने वालियों में इंदु भी थी.

फर्क इतना था कि इंदु ने अपना सबकुछ गंवाया तो दिल के हाथ मजबूर होकर वो न इसके पहले किसी की थी न इसके बाद किसी की हुई. यंही नहीं उसने राज से कभी कोई लाभ नहीं उठाया.जबकि राज संग रंग -रेलियाँ मनाने वाली स्त्रियां अपनी सारी क़ीमत वसूलती आई थी और ऐसा होना स्वाभाविक था. सिर्फ इंदु ही मतिमंद थी जो राज जैसे कुख्यात शख्स के प्रेम में पागल हुई थी.जबकि कुछ युवतियाँ राज की शानोशौकत पर मरती तो कुछ उसके स्टेटस और ओहदे का फायदा उठाने आती थी.

इंदु के साथ ऐसा नहीं था उसे अपने परिवार में स्टेटस की कोई कमी नहीं थी न ही वो इन बाहरी करत्रिम आडम्बरों की भूखी थी.वो बस राज को चाहती थी और उसी के नाम की प्रेम -साधना में तल्लीन थी गर्वित थी जो कि उसकी मूर्खता की बेइंतहा थी.

किन्तु राज शेखर ऐसा नहीं था अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद भी वो अय्याशी का कोई मौका नहीं गंवाता था. उसकी नियत हमेशा पर -स्त्री पर फिसलती थी और उसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था कि इंदु जैसी साध्वी उसके लिए प्रेम में गृहस्थ जीवन का त्याग करके एकांतवास काट रही है.

वह प्रेम को नहीं मानता था वो मात्र अश्लील काम -संबंधों का कीड़ा ही उसके गंदे दिमाग़ में कुलबुलाता था. जबकि अजय एक नौजवान था एक संस्कारवान व सुशील अपनी माँ जैसे ही धीर-गंभीर. वह देखते ही ताड़ गया कि राज एक खिलन्दड़ा कामुक पुरुष है जो उसकी माँ के बचे हुए यौवन को भोगने को इधर आया है.

अजय का ह्रदय तड़प उठा. आखिर वो लम्पट उसकी सीधी -साधी और भोली माँ को क्यों लुटना चाहता है ये लुटेरा राज शेखर? क्या एक बार खिलवाड़ से इसका मन नहीं भरता? राजनेता होने के नाते राज के खिलन्दड़े चरित्र से सभी अच्छी तरह वाफीक थे. तभी एक लापता नर्स के अपहरण के मामले में राज शेखर के गिरोह का ही हाथ माना गया था और राजनीतिक रसूख के चलते मामला रफा -दफा किया गया था.

इंदु भले ही वर्तमान में नहीं जीती थी किन्तु अजय को जानकारी में सबकुछ रहता था. वह कॉलेज जाता तो नीची नज़र ही रखता था उसकी आदत नहीं थी कि इधर -उधर नज़रे दौड़ाता व लड़कियों के पीछे भागता. इंदु भी जानती थी कि अजय में ये आदत नहीं है पर उसके निर्लज्ज प्रेम संबंध से आहत है अजय ये उसे आभास नहीं था.

अजय राज को देखते ही ताड़ गया था कि राज एक खिलन्दड़ स्वभाव का कामलोलुप पुरुष है जो उसकी माँ के बीच यौवन को भोगने की लालसा में इधर आया है.

इंदु जानती थी कि उसके बेटे में ऐसा दुर्गुण नहीं है जिससे उसे सिर नीचा करना पड़े. किन्तु राज में ये निर्लज्जता थी और अभी भी उसके आचरण में बदलाव नहीं आया था. यूँ ही रूँवासा होने का अभिनय कर उसने इंदु के मोम जैसे ह्रदय को पिघलाने में सफलता पा ली थी. ऐसा नहीं था कि उसे बाहरी लड़की नहीं मिलती थी उसके पास धन की कमी नहीं थी पर धन से खरीदकर भी वो इंदु जैसी सहचरी नहीं पा सका था. यंही कारण था कि इंदु को अकेली और असहाय पाकर उसकी काम -लिप्सा जाग उठी. हमेशा पराई स्त्री को भोगने वाला वो इंदु को पाने के नए मंसूबे बाँधने लगा.

हेमा उसके बाद आई तो उसके पास राज शेखर का एक लिफाफा था जिसे उसने हँसते हुए इंदु को पकड़ाया. इंदु संशय से भर उठी पर उसने चेहरे पर कोई भाव नहीं आने दिया. हेमा हँस हँस कर बताती रही कैसे कॉलेज के दिनों में उसका राज जी से इश्क ही था. इंदु ये सब बातें राज के मुख से सुन चुकी थी किन्तु हेमा से भी वंही पुराण राज ने शेखी में बघारी थी.

इन सब बातों को भीतर बैठा अजय भी सुन रहा था उसे इन बातों से घिन हो रही थी यूँ कहे कि खून खौल रहा था. ज़ब हेमा विदा लेकर गईं तो इंदु भीतर आई उसकी अजय से नज़रे मिली किन्तु वो एकदम निरलिप्त भाव से निरनिमेष ताकता रहा. इंदु कुछ पल को सिहर उठी फिर वह मुस्करा दी तो अजय के चेहरे पर भी हल्का स्मित आ गया किन्तु वो तनावरहित नहीं हो सका.

इंदु अपने कक्ष में पलंग पर बैठकर खत पढ़ने लगी कंधे का आंचल हल्का सरक आया था वह यूँ ही डूब कर पढ़ रही थी.

शेखर ने उसे उसकी शास्त्रीय नीति -रीति से प्रशंसा की थी. वह हिंदी का प्रकाण्ड पंडित था. इसी से उसने जाने कितने रसीले छंदो से इंदु के रूप को महिमामंडित किया था.

वह होठों से पत्र को छूते हुए बीती मुलाक़ातों को याद कर रही थी तभी बाहर खटका हुआ और देखते ही देखते सरोजा आ गईं. अभी -अभी वो गांव से आई थी. इंदु ने पलंग से उतरकर फ़ौरन पाँव छुए.

जलपान वगैरह के बाद सरोजा ने पूछा -किसका पत्र पढ़ रही थी भाभी!

दोनों में लुकाव -छीपाव तो था नहीं इंदु ने हँसकर राज शेखर का पत्र दे दिया.सरोजा ने सरसरी तौर पर पत्र देखकर कहा -उसे शर्म नहीं आती, बीबी मर गईं और वह इधर मुंह मारने लपक रहा है.

इंदु सिर नीचा किये लौकी काट रही थी. सरोजा गांव से सब्जी लाई थी. आगे सरोजा बोली -अब उसकी बातों में मत आना. कितने बरस तुमने अकेले काटे उसने भूल से भी कभी पूछा क्या?

इंदु ने जवाब नहीं दिया. इधर -उधर की बातें होती रही. सरोजा का शरीर अब भारी हो चला था. जरा सा काम के बाद वो थक कर बैठ जाती थी. वह हाँफने लगती. इंदु मुस्कराई तो वह कहने लगी -तुम अच्छी हो, अब तक वैसी ही हो. ना पेट निकला न ही फालतू मांस चढ़ा.

अंततः अपना काम निपटा कर सरोजा भी गांव लौट गईं वह गांव में अपने खेती के काम में व्यस्त रहती. यंही उसका जीवन हो चला था अब. इंदु अब अकेले होते ही फिर से शेखर के विचारों में खो जाती जो अजय को बिलकुल पसंद नहीं था. वह चाहता था कि मम्मी उसी की मम्मी के सिवाय कुछ भी नहीं हो किसी की नहीं हो कोई उसके ख्यालो में न रहें.

इंदु भी अपने बेटे अजय का पूरा ख्याल रखती हरदम उसी के संग बिताती किन्तु फिर भी यदि वो कभी गुमसुम हो जाती तो अजय को यंही लगता कि उसकी माँ एक परपुरुष के प्यार में पड़कर पाप कर रही है.

अजय का ह्रदय विदिर्ण होने लगता ज़ब वो कल्पना में भी अपनी माँ को राज के साथ पाता. उसे लगता राज अंकल उसकी मम्मी को न केवल मुर्ख बना रहें है, वरन उन्हें बरगला कर अपनी वासना -पूर्ति कर रहें है.

अजय न तो अपने मन की बात कह पाता न ही इंदु समझ पाती कि युवा हो रहे बेटे के मन में क्या उमड़ -घूमड़ रहा है? वह सुदर्शन युवा बेटा जैसे भीतर -बाहर आहत व खोखला होते रहा पर इंदु अपने प्रेम के भ्रम में पड़ी रही जो कि प्रेम था ही नहीं.

भले ही वो इंदु की तरफ से इकतरफा प्रेम था पर राज की तरफ से वो मात्र एक खिलवाड़ था वासनापूर्ति का. जिसमें वो एक भोली -भाली सह्रदय स्त्री का सतीत्व हरण कर उसका दैहिक शोषण करता है.

ज़ब इतने से भी उसका मन नहीं भरता तो उससे उसकी छोटी बहन की मांग करता है. इंदु तब भी नहीं समझी कि वो नीच धृष्ट है प्रेमी नहीं जिसे वह मानती आई थी.

अजय के लिए ये प्रसंग सहन करने योग्य नहीं है वो खुद को ठगा हुआ और लाचार महसूस करता है. उसे तो अपनी माँ पर पूर्ण आधिप्तय चाहिए. वो नहीं चाहता कि उसके और उसकी मम्मी के बीच कोई तीसरा प्राणी आये. उसकी यंही इच्छा रहती है कि उसकी माँ सिर्फ उसे चाहे उसके प्यार में कोई भागीदार नहीं हो. यंही कारण है कि उसकी पीड़ा बढ़ती जाती है.

क्रमशः

नोट -पारिजात का पुनरलेखन करते हुए नॉवेल में मुझे इतनी त्रुटि मिली है कि इसके प्रकाशन पर लज्जा महसूस हो रही है. अब इसे त्रुटिरहित करके छाप रही हूँ. 🙏

Jogeshwari sadhir sahu @copyright

20/1/23

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