पारिजात (भाग -4)

पारिजात (भाग -4)

पारिजात (भाग -4)

A क्लासिक love story 

Jogeshwari sadhir sahu

अध्याय 1

अगले दिन इंदु ने अजय के साथ स्कूटी खरीदने का प्रोग्राम बनाया और वे दोनों गाड़ी खरीदने में व्यस्त रहे. दोपहर बाद ज़ब गाड़ी आई तो इंदु ने अजय को मिठाई का डिब्बा देकर कहा कि वह अपनी मित्रों को गाड़ी खरीदने की मिठाई खिला आये.

अजय को माँ का कहना मानना पड़ा. इस तरह वह ज्योंही मिठाई लेकर पहुंचा दोनों बहनें भी जैसे उसके इंतजार में ही बैठी थी.

अंजू ने पूछा -काहे की मिठाई है अजय जी?

अजय ने बताया -स्कूटी खरीदी है…

“ओह!” अंजू अब अर्थपूर्ण तरिके से पारो की ओर देखकर मुस्करा दी तो पारो के चेहरे पर शर्म की लाली दौड़ गईं. चेहरा आरक्त हो उठा.

अंजू का ईशारा तो पारो समझ गईं किन्तु कुछ भरी हुई सी ही थी, सो मुस्करा कर कटाक्ष कर बोली -मिस सूबेदार को ले जायेंगे गाड़ी से…

इस पर अजय को चिढ़ सी हुई वो गुस्से में मिठाई का डिब्बा वंही दोनों के सामने रखकर निकल गया.

अजय के तेवर देखकर पारो और अंजू एकदम से भयभीत हो गईं. हरदम मुस्कराते रहने वाला वह युवक यूँ नाराज भी होता है ये उन दोनों शरारती बालाओं को नहीं मालूम था.

वह तो जा चुका था अब क्या करें? तुरंत उसके पीछे जाना उचित नहीं था सो शाम घिरने पर ज़ब भाई नीलकांत ने भोजन कर लिया तो दोनों खाना खाने के पहले अजय के घर जा पहुंची. इंदु को इस बीते घटनाक्रम का कुछ पता नहीं था.

एक बारगी पुनः अंजू ने इंदु के संग रसोई की कमान संभाली और छुईमुई सी पारो अजय के रूम में द्वार खटखटाती गईं अजय ने पारो को देख कर कुछ कहा नहीं निसंदेह वो गुस्सा था.

इंदु ने मिठाई देकर कहा -आपने तो खाई नहीं सारी वंही छोड़ आये.

इसपर भी अजय ने कोई जवाब नहीं दिया और चुप्पी साधे रहा. पारो को अब बेहद अपमानित महसूस हुआ. वो पलट कर जा ही रही थी कि इंदु ने पीछे से आवाज दी. पारो जाते -जाते लौटकर अब इंदु के पास आ गईं. इंदु ने पूछा -क्या हुआ? आजकल तो तुम मुझसे मिलती ही नहीं हो.

पारो को कुछ सुझा ही नहीं कि वो इस उलाहने भरे परिहास का क्या उत्तर दे?

अंजू ने बात संभाली -नहीं आंटी!वो इसे अपने सब्जेक्ट के बारे में बात करनी थी.

सुनकर इंदु मुस्करा दी वो समझ गईं यौवन के उन दिनों की चालों को जो इसी तरह से की जाती है. इंदु ने फिर भी पूछा -तो फिर बिना बोले क्यों जा रही थी?

इंदु की अनुभवी नज़रों ने ताड़ लिया था कि पारो का चेहरा तो उतरा हुआ है.

तभी अजय आ गया ये कहते हुए -मम्मी!इन्हें मिस सूबेदार के प्रति गलतफहमी है….

इस पर इंदु ने पारो की ओर देखा जो एकाएक ही दोषी ठहराये जाने से उत्तर तलाश रही थी. इंदु हँस पड़ी….. काफ़ी बरसों बाद अजय ने जैसे माँ को हँसते हुए देखा था.

इंदु ने उन्हें बैठने का आग्रह किया सभी बरामदे में पड़ी चेयर पर बैठ गये. तब इंदु ने बताना शुरू किया -उन दिनों की बात है ज़ब मिस सूबेदार नई -नई पोस्टिंग होकर आई थी, तो इसी रूम में रहती थी जंहा आजकल आप लोग रहते है. तभी हमारा ये घर बना और हम यंहा रहने आ गये. अजय का उन दिनों ग्यारहवीं का एग्जाम था उसे ज़ब कई सवाल नहीं बनते तो मिस सूबेदार उसे पढ़ा देती थी. वो इसे छोटे भाई की तरह मानती थी. अभी देखना रक्षा -बंधन आएगा तो वो आयेगी इसे राखी बाँधने….

इस पर पारो के मुंह से निकला -ओह!

उसने अजय को देखा पर वो रोष से भरा नज़रे चुराए रहा. अंजू बोल पड़ी -तो इन्होंने विवाह नहीं किया?

इंदु -मैंने यह कभी नहीं पूछा कि क्यों शादी नहीं की उसने?

कहकर इंदु भीतर चली गईं.अब दोनों बहनें भी घर लौट आई. इंदु को लगा वो सभी हमउम्र बच्चे बातें करेंगे सो वो उन्हें छोड़कर सांध्य -पूजा करने चली आई थी. अब भी अजय ने बात नहीं की तो अजय का चेहरा म्लान सा हो गया.

घर आकर अंजू ने पारो से कहा -चलो खाते है मुझे बहुत भूख लगी है.

पारो ने फिर वंही ना खाने का मन है कहते हुए वो उपर छत पर चली गईं.

छत पर चुपचाप बैठी रही कि उसे किसी की पदचाप सुनाई पड़ी. देखा अजय पास आकर बैठे है.

ओह!तो मनाने आये है.

सोचते हुए पारो ने मुंह फेर लिया. अजय ने उसे गुलाब की कली भेंट की तो भी वो चुप रही.

अजय ने उसकी चुनरी का छोर पकड़ा तो पारो ने हठात वह भी छुड़ा लिया. अजय ने मानी हुई प्रेयसी को मनाते हुए पूछा -गलती किसकी थी.

पारो के मुंह से अनायास निकला -तो क्या हर बार मेरी गलती होती है? आप तो जैसे दूध के धुले है?

अजय के मुख से निकला -इतनी महंगी चीज से मै मुंह कैसे धो सकता हूँ?

पारो ने आशय समझा तो वंही खड़ी हो गईं और पलट कर जाने लगी. इस पर अजय ने उसका हाथ पकड़ लिया. अगले ही पल अजय की समूची देह इस झूमा -झटकी में अजय के कंधे से आकर लग गईं. इतनी भरी हुई गरमाहट से भरी देहयष्टि का स्पर्श अजय को जैसे मदहोश कर गया. तभी वंहा पर पारो को ढूंढती हुई अंजू आ गईं. दूर से देख नहीं पाई कि इधर अजय और पारो इतने निकट आ गये है सो वो एकदम से पीछे हटकर जाने लगी तो पारो अपना हाथ छुड़ा कर भागती हुई उसके साथ चली आई.

अजय को लगा ये भी खूब आंख -मिचौंनी खेलती है. कभी गुस्सा होती है… कभी दूर जाती है… कभी नजदीक आती है. क्या करें… इसका?

मन ही मन कहते हुए अजय नीचे आकर इंदु से बोला -माँ!बड़ी भूख लगी है…

यह कहते हुए वो माँ से लिपट गया.

इंदु को लगा उसका खोया हुआ सा बेटा जैसे कोई जंग जीत गया है. उसने पल भर को बेटे के सिर पर हाथ फेरा और भोजन लगाने लगी. ऊपर पारो और अंजू हँस हँसकर खाना खा रहे थे.

अध्याय -2

मिस सूबेदार का रंग भी साफ था साधारण नैन -नक्श की अच्छी दिखती थी अच्छी पोस्टिंग के बावजूद वो विवाह नहीं कर सकी. या यूँ कहे कि विवाह की उम्र निकलती जा रही थी.ज्यादा ऊँची नहीं थी किन्तु वे देखने में अच्छी लगती थी फिर भी विवाह के मार्किट में उनकी डिमांड नहीं हुई होंगी ये तो असम्भव था. जरूर रिश्ते आये होंगे पर उन्हें जंचा नहीं होगा.

उनके पिता सेना में सूबेदार थे और उनका परिवार यंही सरनेम लगाने लगा था. उसकी माँ भी थी जो साथ ही रहती पर बड़ा सा बंगला सूना ही लगता था.

वो मिस सूबेदार का जन्मदिन था सो उन्होंने सभी को बुलाया था. यंही इंदु और अजय तो अजय ने पारो और अंजू को भी साथ चलने के लिए मना लिया था. पारो अपनी माँ की साड़ी पहनकर तैयार हुई थी जो कि बेहद खूबसूरत लग रही थी. हल्के से मेकअप से भी उसके चेहरे की रंगत बता रही थी कि उसने दिल से श्रंगार किया है. वे सभी जाने के लिए निकले तो पहले सोचा गया कि अब जायेंगे कैसे?

इंदु ने अंजू के संग रिक्शे में जाने की बात रखी तो पारो का चेहरा रक्तिम पलाश जैसा हो गया. निसंदेह वो अजय के संग उसकी स्कूटी से जायेगी.

अजय ने हल्के सलेटी रंग की शर्ट और काई कलर की पेंट पहनी थी. धूप से बचने के लिए एक स्कार्फ कंधे पर था.

इंदु व अंजू के लिए रिक्शा बुला लिया गया तो अंजू ने पारो को शरारती मीठी निगाह से देखा था बदले में पारो ने लज्जा से हल्के से होंठ काटे कि रुक!तुझे बताती हूँ.

वंहा पहुंच कर इंदु तो मिसेज़ सूबेदार यानि माया सूबेदार जी की माता जी से बात करने में व्यस्त हो गईं. पारो को फिर यंही लगा कि वो जाने क्यों मिस सूबेदार से उतना खुलकर बात नहीं कर पाती है. अजय ने मिस से कहा कि वो कोई गाना सुनाये क्योंकि वो हमेशा ही कॉलेज के फंक्शन की इंचार्ज होती है और गाती भी है.

मिस सूबेदार ने तब आंधी फ़िल्म का गीत गाया क्लासिकल सांग…. इस मोड़ से जाते है…. कुछ सुस्त कदम रस्ते कुछ तेज कदम राहें….

अजय ने मिस सूबेदार को रजनीगंधा के फूलों का बुके दिया था. अब पारो से सबने आग्रह किया कि वो कुछ गाये… खासकर मिस सूबेदार के इसरार पर वो गाने लगी…

रजनीगंधा फूल तुम्हारे महके यूँ ही जीवन में ऐसे ही महके प्रीत पिया की मेरे अनुरागी मन में…

सुनकर अजय का चेहरा जैसे लाल हो गया. इंदु ने कनखियों से बेटे के चेहरे को देखा. इंदु मन ही मन बहुत प्रसन्न लग रही थी. इंदु ने मन ही मन दुआ की कि अजय व पारो का जीवन भर का साथ हो जाये. शाम तक जलपान कर सभी ने बिदा ली.

लौटते वक़्त भी वंही क्रम रहा बीच में ज़ब वक़्त मिला तो अंजू ने पारो की कलाई पकड़कर हाथ दबा दिया मानो कह रही हो क्या बात है? पारो वैसे ही लाज से सुर्ख रतनार हो रही थी.

रात को घर लौटकर छत पर बड़ी देर तक पारो और अजय साथ -साथ बैठे रहे. कोई बात नहीं थी बस झिलमिल सितारों की छाँव थी और दो जंवा दिलों की धड़कन की सरगम थी.

कुछ लम्हें यूँ ही ख़ामोशी से गुजर गए. अजय ने धीमे से ज़ब पारो का हाथ थामा तो उसे लगा मानो उसकी धमनियों का रक्त जम रहा है किन्तु श्वास तेज होता जा रहा है.

पारो ने हाथ नहीं खिंचा यूँ ही अजय के हाथों में उसकी हथेली पिघलती -पसीजती पड़ी रही इतनी कि पारो का ब्लाउज पसीने से तर -बतर हो गया.

अजय ने फिर उसकी कोमल हथेली को अपने होठों से लगा लिया. अपने प्रियतम का अधर -स्पर्श पाकर जैसे पारो आपे में नहीं रही वह एकदम थरथराती सी उठी और जाने को उद्यत हुई.

अजय ने उसका हाथ अब भी नहीं छोड़ा था वह उसे रोकना चाह रहा था पर कह नहीं सका कि.. रुको…!

थोड़ी देर ठहर जाओ…!

ये शब्द अजय के मुख से नहीं निकल सके बस होठों में ही जैसे अटके रह गये.

आखिरकार अंजू के कदमों की आहट से दोनों स्वतः अलग हो गए अंजू ने बहुत आहिस्ते से पुकारा -दीदी…

और सच में मिलन के इन क्षणों में ज़ब पारो विलग होकर जाने लगी तो अजय ने बस इतना ही पूछा -अब कब मिलोगी…?

पारो छिटक कर पल भर में पारो के पास आ गईं. अंजू वैसे तो उसकी छोटी बहन थी पर इस वक़्त वो माँ की तरह से पारो पर नाराज हो रही थी. वो पारो को पकड़कर खिंचती हुई नीचे के रूम में ले गईं जंहा वो दोनों साथ सोती थी जबकि नीलकांत सामने सोते थे.

पारो ज़ब दर्पण के सामने खड़े होकर अपने झुमके उतारने लगी तो अंजू पास आकर बोली -आप जानती है आप क्या कर रही हो?

पारो ने एकदम ठंडे लहजे में कहा -नहीं…

अंजू को इस पारो से ऐसी उम्मीद कतई नहीं थी, जो कुछ माह पूर्व उसे माँ की तरह संभालती थी बात -बात पर डांटती और लेक्चर झाड़ती थी कि कैसे चलना है, कैसे उठना है कैसे पहनना -ओढ़ना है?

अंजू ने आज विस्फारित नेत्रों से उसे देख कर कहा -आप बड़ी है आपको अपनी मर्यादा जाननी चाहिए… यदि भैया को इस सबकी भनक लग गईं तो…

किन्तु इस वक़्त तो पारो किसी और ही रंग में रंगी थी. वह बिलकुल भी कुछ नहीं सुन पा रही थी. कुछ देर में घर के कपड़े पहनकर वो शरदचंद्र का नॉवेल देवदास पढ़ रही थी.

अंजू ने भी कोई बात नहीं की वो अपने नोट्स तैयार करने लगी. उसने सोच लिया कि कल से वो पारो के संग पैदल ही कॉलेज जायेगी अजय के साथ किसी भी क़ीमत पर नहीं जायेगी.

कॉलेज वैसे भी एकाध किलोमीटर की ही दूरी पर था. सभी छात्राएं पैदल जाती थी हमउम्र लड़कियां बतियाते चली जाती थी उन्हें पता भी नहीं चलता था कि रास्ता कैसे कट गया?

अंजू ने यह दृढ निश्चय मन ही मन कर लिया और मन ही मन बोली -हूँ.. किसी को बताने की क्या जरूरत है?

वो अपने आप में बुदबुदाई थी.

किसी से यंहा उसका तात्पर्य अजय से ही था.

पारो तब तक नींद में खो गईं थी. उपन्यास हाथ से छूटकर नीचे गिर गया था अंजू ने झुककर उठाकर रखा फिर धीमी लाइट ऑन की और अपनी बड़ी बहन को गौर से देखने लगी. तेज लाइट बंद कर देने से मद्धिम लाइट में पारो का रंग बहुत ही निखरा दिख रहा था वो अंजू से महज दो -ढाई बरस ही बड़ी होंगी.

इस वक़्त पारो जैसे सुध -बुध बिसराये स्वपनों में खोई थी उसकी बिखरी हुई लटें बहुत ही प्यारी लग रही थी चेहरा मासूम और खिला हुआ था उसके अधर लाली से सूर्ख लग रहे थे रंग स्वर्णचम्पा जैसे सुनहरा लग रहा था.

अंजू को लगा वो अपनी इस सुन्दर सी बहन के कपोलों को चूम ले और उसने साथ में सोते हुए पारो के कमर में हाथ डालकर उससे चिपक कर एक पप्पी ली दोनों रोज ऐसे ही सोती थी. रोज का ही ये क्रम था कि अंजू अपनी सुन्दर नवयौवना दीदी के कपोल चूम लेती थी बदले में पारो उसे एक चपत जड़ती और मुंह फेरकर सो जाती.

अंजू पारो से चिपक कर ही सोती थी ये उन दोनों बहनों के सोने का ढंग था. घर में चाची -ताई देखती तो अंजू को छेड़ती -रुक!पारो का ब्याह हो जाने दे फिर देखते है ऐसे कैसे बहन से चिपक कर सोती है?

अंजू भी मुस्करा कर कहती -हूँ ज़ब ब्याह होगा तो देखेंगे अभी तो दीदी हमारी है.

आज पारो ने उसे चपत नहीं जड़ी अल्बत्ता अंजू को लगा जरूर अजय ने दीदी से प्यार जताया होगा तभी तो वो इस तरह से उसके सपनों में खोई है कि उसे चपत जड़ना भी भूल गईं. अंजू सोचने लगी यदि अजय ने ये सब घुलना -मिलना बंद नहीं किया तो वो इंदु आंटी से जाकर कह देगी कि वो अपने लाड़ले को समझा ले वरना…..!

अगले दिन ज्योंही अजय उन्हें लेने गाड़ी से आया और उसने उनके ब्लॉक के सामने आकर हॉर्न बजाया. पारो हमेशा की तरह से तैयार थी जाने को ज्योंही उद्धत हुई तो अंजू ने उसे हाथ पकड़ कर रोका और बाहर निकल कर बोली -अजय जी!हम बाद में आती है आप निकलिए…

वह अन्यमन्यस्क -सा कॉलेज गया ये दोनों निकली तो बीच रास्ते में मिस सूबेदार की गाड़ी पास आकर रुकी. दोनों को ना कहते नहीं बना वैसे भी वो उनकी मैडम है पानी में रहकर कौन मगरमच्छ से बैर ले वाली मानसिकता के साथ दोनों मिस की गाड़ी में बैठकर कॉलेज पहुंची. जंहा अजय अपनी गाड़ी रखकर उन दोनों की प्रतीक्षा कर रहा था वंहा दोनों को देख कर उसने उनसे बोलना चाहा पर अंजू चुप से अपनी क्लास में चली गईं और पारो को मिस सूबेदार से ही चर्चा करनी थी तो वो उनके साथ ही निकल गईं.अजय को चिढ़ाते हुए दोनों बहन चली गईं थी बिना बोले.

चुंकि मिस सूबेदार के पीरियड चल रहे थे तो पारो उनके फ्री होने का इंतज़ार करती लायब्रेरी में चली गईं जंहा जाकर वो डॉ अनंत राम मिश्र के नदी -काव्य पर किताबें देखने लगी तभी वंहा अजय आ पहुंचा. पारो ने उसे सवालिया निगाहों से देखा मानो पूछ रही हो आपकी क्लास?

पर जाहिर तौर पर वो कुछ बोली नहीं… अंजू की चेतावनी याद आ गईं.अंजू कह रही थी जैसे -दीदी!इतना याद रखना कुछ ऊंच -नीच हुआ तो सब कहेंगे… माँ नहीं थी तो…

अजय लायब्रेरी में बैठी पारो के पास आकर बैठा.. देखा तो पारो बिलकुल नहीं बोल रही है तो उसने अनंत राम मिश्र जी की पुस्तकें निकलवाई ताकि पारो को सहूलियत हो सके. इस तरह से जैसे पारो को झुरझुरी सी आ गईं वो चुप रही तो उसके एकदम नहीं बोलने से अजय का दिमाग़ सांय सांय करने लगा.

वो उठा और सीधे गाड़ी लेकर घर चले गया रास्ते में गाड़ी तेज स्पीड की वजह से मोड़ पर टर्न लेकर गिर गईं. किसी ने उठाकर उसे घर पहुंचाया गाड़ी को सुधरवाने गैरेज भेजा गया. अजय को हल्की चोट कंधे पर आई. अस्पताल में पट्टी बांधकर उसे घर पर ही पूर्ण आराम की सलाह दी गईं.

पारो और अंजू दोनों कॉलेज से ज़ब घर पहुंची तो इंदु के घर की कामवाली ने बताया कि बाबू को चोट आई है.

क्या…? ये सुनते ही पारो के मस्तिष्क में संसनाहट महसूस हुई. उसे लगा कि उसे इसी तरह से लायब्रेरी में झुरझुरी आ गईं थी. वो जिस हालत में थी वैसे ही इंदु के घर शीघ्रता से पहुंची.

उस वक़्त वो एक पुराना घाघरा और टॉप पहने हुए थी,   जामनी रंग का व ऊपर से चुनरी लपेटे थी यह बेहद स्टाइलीश परिधान था. माँ के जीवित रहते खरीदा था तब से इतना महंगा शूट उसने फिर नहीं लिया था यह उसे माँ ने ही लेकर दिया था. पुराना हो चला था पर उसपर फब्ता बहुत था. ज़ब चुनरी चलते हुए लहरा कर गिर सी पड़ती तो वो यूँ ही लापरवाह सी संभालती हुई अजय के कक्ष में पहुंची.

वो दीवार की ओर करवट लिए पड़ा था. दीवार पर क्या देख रहा है ये सोचकर पल भर पारो ठिठकी किंतु उससे रहा नहीं गया. उस वक़्त अजय के दांये कंधे पर पट्टी बंधी थी. उसने झट से खुद को चादर से ढका वह बनियान में कभी खुद को किसी भी लड़की के समक्ष सहज नहीं हो पाता था. पारो ठिठकी समझ में नहीं आया कि अपनी भावनाएं कैसे जताये. अंततः वह अजय के मुख की ओर आकर जैसे ही खड़ी हुई अजय ने हाथ में रखी कनेर की छिली हुई नंगी छड़ी से उसके माथे पर सटाक से मार दिया.

आह…!कहते हुए वो वंही बैठ गईं. अजय मुंह फेरकर लेटा रहा. पारो को चक्कर सा आ रहा था. किसी तरह खुद को संभालते हुए उठी और माथे पर उस चोट को दबाने लगी… जंहा कनेर की छड़ी की चोट से खून बह रहा था. उसने तब अजय से इतना ही कहा -हो सके तो माफ कर दो..

और वो बाहर चले गईं.उस वक़्त पारो की चुनर रक्त से तर -बतर हो रही थी. इंदु को खटका हुआ तो बाहर आई किन्तु पारो ने एक क्षण भी गंवाये बगैर वंहा से जाना ही उचित समझा. क्योंकि उसके वंहा रुकने से बखेड़ा खड़ा होता था. इंदु ऐसी हालत में उसे देख नाहक अजय को डांटती और उसकी डांट का कारण पारो नहीं बनना चाहती थी.

सो वो भागते हुई सी अपने घर गईं व एकदम से पलंग पर गिर गईं. अंजू तब नोट्स तैयार कर रही थी. उसे कुछ मालूम ही नहीं था. तब तक पारो अपनी चोट को चुनरी से दबाने का भरसक प्रयास करती रही और अपनी सिसकी को भी दबाती रही.

अंजू का ध्यान आखिर गया ही इस ओर कि पारो दी लौटकर क्या कर रही है जरा पूछे तो उनकी अजय से खटपट का क्या हो रहा है? किन्तु ज़ब वो भीतरी कक्ष में गईं तो पारो को असहज हालत में लेटे देख पहले तो कुछ समझ नहीं पाई.

आखिर अठारह-उन्नीस बरस की अंजू को क्या समझता? वो पास आकर ज़ब पारो के कंधे को पकड़कर झिझोड़ती हुई अपनी ओर पलटती है तो देखती है कि पारो की हिचकियाँ बंध गईं है.

उसकी चुनरी रक्त से रंगी है अंजू को ये देखकर गश आ जाता है दीदी.. दीदी!

वो उसे पुकारती है तो पारो सीधे अंजू के कंधे से लगकर रोने लगती है. अंजू उसे थपकी देकर दिलासा देती है फिर उसे सामने कर पूछती है -क्या हुआ बता और ये चोट कैसे लगी… क्या?

आगे के शब्द अंजू के गले में ही फंस गये… ओ….!

घृणा से उसका चेहरा सुर्ख हो गया तब पारो उसके गले से लगकर कहती है -उसने मुझे मारा….

क्या….?

अंजू ये सुनकर शेरनी की तरह बिफर उठती है. उसकी मुट्ठियां भींच जाती है.

इतना अपमान!छी…!

अंजू को लगता है वो भी पारो दीदी को चांटे जड़ दे. ये चुपचाप उस अहमक लड़के की मार खाकर लौटी है. उसे लगा बाहर जाकर थूक दे.

क्यों दीदी?

अंजू उसे झिझोड़ कर पूछती है…

आपने क्यों चुपचाप उसकी मार सही?

इस पर पारो चुप रहती है…. अंजू को लगा ज्यादा खून बहने से वे सन्न रह गईं है सो फ़ौरन रसोई से हल्दी ले आई और चोट पर लगाकर माथे को एक कपड़े से बांध दी.

वो खून से तर -बतर चुनरी उसने संभालकर छिपा कर रख दी ताकि इंदु को ले जाकर बताएगी… देखिए!आपके लाड़ले की करतूत…!

फिर दूध गर्म कर हल्दी डालकर लाती है व पारो को देती है. पारो दूध पीकर बिस्तर पर लेट जाती है. उसे नींद आ जाती है. अंजू ने आकर पारो को चादर ओढ़ा दी और अपनी उस भोली भाली मासूम बहन को सोते हुए देखने लगी.

इस वक़्त पारिजात का मुखड़ा बिलकुल गुलाबी होकर दमक रहा था उसके अधर पर एक विजीत सा स्मित था. अंजू को यह देखकर पारो पर बेतरह लाड़ उमड़ आया उसने हमेशा की तरह अपनी प्यारी सी बड़ी बहन के माथे की पप्पी ली किन्तु पारो को स्वप्न में लगा कि शायद अजय ने ही उसे चूमा है सो उसने चादर को अपने वक्ष पर मुट्ठीयों में जोरों से भींच लिया.

इस पर अंजू को उस दुःखद घड़ी में भी अपनी भोली दीदी की मासूमियत पर हँसी आ गईं. उसने हल्की -सी चपत उसके रेशमी गाल पर जड़ दी तो वह चुपचाप उठ बैठी.

अंजू अब पारो के पास आ बैठी और उसके गिर्द बाहों का घेरा करके उसके कान के पास मुख सटाकर बोली -जल्दी बताओ!क्या हुआ था? मुझे बड़ी अदालत में केस ले जाना है.

पारो ने नीची नज़र करके कहा -कुछ नहीं हुआ!

अंजू को अब बहुत चिढ़ छूटी -अरे!मानती क्यों नहीं? उसने तुम्हें सीधे माथे पर मारा है अभी चाहूं तो उसे अदालत में बंद कर सकती हूँ क्या समझता है वो? उसके बाप का कर्जा खा रहे है?

पारो एकदम से व्यग्र होकर उसके मुख पर हाथ रखकर कहती है -मै तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ यह बात इंदु जी हरगिज न कहना…

तभी बाहर किसी की आहट हुई देखा तो इंदु ही थी. पारो ने धीमे से कहा -मेरे सिर की कसम….

अरे… अंजू का मुख खुला का खुला रह गया. इंदु शायद किसी पूजा का प्रसाद देने आई थी. यह पूजा उसने इसलिए की थी कि अजय को दुर्घटना में ज्यादा चोट नहीं आई थी और वो सही सलामत था. ईश्वर ने उसे बचाया था. उसी का धन्यवाद वो करने भगवान को प्रसाद चढ़ाने मंदिर गईं थी वंही से प्रसाद लेकर आई थी. तभी उसका ध्यान पारो के माथे की चोट पर जाता है -अरे!ये क्या?

बेसाख्ता इंदु के मुख से निकल पड़ता है.

जी…!अंजू कुछ बोलना चाह रही थी तो पारो उसे बीच में रोककर कहती है -यह… बस यंही… अलमारी से टकरा गईं थी…

इंदु के चेहरे पर दर्द की लकीरें… साफ पढ़ी जा सकती थी. अंजू ने दोनों को बतियाते देखा तो इंदु को बिठालकर भीतर पानी लेने चली गईं.

इंदु ने पास बैठकर पारो के माथे को अपने आंचल से पोंछा उसकी लटें संवारी. अंजू तब तक पानी लेकर आई तो इंदु ने उसे हल्दी लाने कहा.

इंदु ने अपने हाथों से हल्दी लगाई. डॉक्टर को बुलाने की बात कही तो अंजू ने चिढ़ते हुए कहा -नहीं!ठीक हो जायेगा…

तभी बाहर नीलकांत बैंक से लौट आये. इंदु ने अब जाना ही उचित समझा. बाहर निकलकर.. कभी घर आईये…

कहते हुए इंदु घर लौटी.

उसे समझ नहीं आ रहा था कि अजय की चोट के वक़्त ही पारो को चोट कैसे लगी है. और वो रसोई में जाकर दूध में हल्दी डालकर पका कर बड़े प्रेम से कामवाली कमु के हाथों पारो के लिए भेजी.

अंजू ने ये देखकर व्यंग्य से पारो की ओर देखा पर पारो इन सबसे बेपरवाह कमु के सामने सारा दूध पिया ताकि इंदु पूछे तो कमु बता सके कि पारो ने उनका दिया दूध पी लिया है.

पारो के प्रति इंदु के मन में ममता थी यदि उसका बश चलता तो वो अपना दूध ही उसे पिलाती वह इस तरह एक बच्ची की तरह ममता से उसे चाहने लगी थी. पारो को दूध पीकर बहुत आलस आया तो वो गहरी निंद्रा में सो गईं.

अंजू को अकेले खटना पड़ा गृहकार्य में तो उसने मन ही मन में अजय को बहुत खरी -खोटी सुनाई.

ज़ब वो सारे कार्य निपटा कर पारो से चिपक कर सोने आई तो इतना ही बोली -आप यंहा आकर अच्छा आराम फरमा रही है…

पारो बस नींद में मुस्करा दी.

क्रमशः

Jogeshwari sadhir sahu

विरार w मुंबई

Jogeshwarisadhir@gmail.com

9399896654


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