फिर वंही प्रतिम…

अनुभव -जोगेश्वरी सधीर

जीवन में कुछ लोग बहुत सालों बाद भी मिलते है तो भी उनका वंही प्रभाव रहता है.

आज मुंबई महाड़ा में साईं दीप वेज  डाइन से खाना लाते हुए मुझे एक शख्स दिखा अमेरिकन चड्डा पहने टी शर्ट में. उसके हाथ बहुत हिल रहे थे उंगलियां कांप रही थी तो मै उसे देखने लगी. बीस बरस पहले का वाकया याद आ गया. अरे ये तो प्रतिम है.

उसे देख मै अपने आप से बोली.

तब भी मै महाड़ा में रहती थी. प्रतिम तैयार होकर एक शाम आया और बड़ी लम्बी -चौड़ी वार्ता करके बोला था -आप गांव से फाइनेंस मंगा लो. मै गौरी प्रोडक्शन में फ़िल्म बना दूंगा.

मुझे हमारे एस्टेट एजेंट ने बताया कि वो कोई सही नाम नहीं है. उसके झांसे में नहीं आना.

बात आई गईं हो गईं. उसका एक परिचित हमसे कुछ रूपये ऐंठने में कामयाब हो गया. फिर हम लोग गांव वापस आ गए. क्योंकि यंहा ऐसे गिरोह बहुत होते है जो पैसा ऐंठते है. ठगो की मायानगरी में बहुत भरमार है.

आज 20 साल बाद वंही महाड़ा की सड़क पर वो प्रतिम मिल गया उसका वैसे ही रुखा चेहरा और हाथ की उंगलियां हिलती हुई.

ये कह रही थी कि जमाना बदल जाता है पर इंसान की फितरत नहीं बदलती. तब मै उसका फोन नंबर लेकर मिलने की बात करके ज़ब अपने रूम तरफ जा रही थी तो यंही सोच रही थी कि लोग सालों बाद मिले तब भी उनका प्रभाव वंही रहता है.

प्रतिम ने भले ही कहा कि वो 30 साल से किसी मीडिया कंपनी में डायरेक्टर है पर जाने क्यों मुझे उससे ज्यादा आशा नहीं है. फिर भी कहा है तो मिलने जरूर जाउंगी.

लेखिका -जोगेश्वरी सधीर


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