माँ !तुम बहुत याद आती हो !

कविता स्वरचित मौलिक 

माँ !तुम बहुत याद आती हो !

माँ !तुम्हें गुजरे अरसा हो गया 

पर तुम बहुत याद आती हो 

जब याद आती हो 

तो लगता है 

जैसे कल की ही बात हो 

जब तुम थी घर मे 

अपने यौवन के दिनों मे 

उल्लास से भरी हुई 

दौड़ कर घर के काम निपटाती 

मुस्कराती हुई रसोई बनाती 

माँ !तुम घर के 

हर कोने मे नज़र आती थी 

तुम्हारे होने के अहसास से 

घर गमकते रहता था 

घर घर न होकर 

एक मंदिर था 

माँ !तुम जबसे गई 

मुझे घर किसी ने नहीं बुलाया 

कंहा तुम होती थी तो 

4 दिन फोन न करो तो 

कहती थी 

बेटी !नाराज हो क्या? 

सच !याद कर आँखों मे आंसू झलकते है. 

कवियत्री जोगेश्वरी सधीर 

 


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