मेरी रोमांटिक कविताएं मुग्धा मे है

मुग्धा (काव्य )

1-मेरे मन के नगर मे /मेहमान बनके तुम आये /मेरे ह्रदय -सरोवर में /कमल से खिलकर मुस्कराये /तुम्हें कभी देखा नहीं /तुम्हारे विषय में /किसी से जाना नहीं /फिर भी अनजाने में ही /तुम्हें अपने सपनों से निकला सत्य मानती हूँ….

इस कविता में जो समर्पण है वो आत्मघाती है इस तरह के अनजान शख्स को बिना परखे प्रेम में पड़ना जानलेवा भी हो सकता है. मेरा भी अनुभव इस काव्य के समर्पण की भावना के बाद अच्छा नहीं था.

कॉपी राइट @jogeshwarisadhir


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