मृत्यु के पहले और मृत्यु के बाद

मृत्यु के पहले और मृत्यु के बाद

मृत्यु के पहले और मृत्यु के बाद क्या होता है?

Jogeshwari sadhir sahu

पति के मृत्यु के पहले और बाद के अनुभव से मुझे ये किताब लिखने की प्रेरणा हुई क्योंकि पति 7अगस्त 2023को चल बसे.

अभी तक तो सब सुनी सुनाई बातें ही थी पर मरने के पूर्व जीवात्मा में कई तरह के आत्मिक शक्ति आ जाती है वो कुछ ऐसा बर्ताव करने लगता है जैसे वो जाने वाला हो.

ज़ब हम उसके साथ होते है तो नहीं समझ सकते किन्तु मृत्यु की ओर बढ़ रहा शख्स अलग ही बोल और देख रहा होता है.

मेरा छोटू डॉगी ज़ब मै बाहर जाती तो मुझे एक पल भी नहीं अलग नहीं करना चाहते थे छोटू तो उस दिन मेरे पीछे दौड़ते आया था. W पप्पी का भी यंही हाल था ज़ब मै जा रही थी तो मेरे पीछे ही लग गया था.

मृत्यु के पहले आत्मा बहुत कुछ जान लेता हालांकि उसे नहीं पता होता पर उसकी सारी गतिविधि इसी तरह की होती है कि वो यंहा से जाने वाला है हमारे बीच से जा रहा है.

हम सोचते है कि ये तो हमेशा रहेगा हमेशा हमारे बीच रहेगा तो हम लड़ते -झगड़ते और उसे डांटते भी है जो कि हमारे बीच से जाने वाला होता है.

जाने या मरने के पहले शरीर कई तरह की क्रिया करता है कोई कई बार पेशाब और लेटरिंग जाते है.

कई के मुख से लार और पानी बहने लगता है. किसी के नाक से भी पानी बहता है.

अपने मुख और नाक से बहते पानी पर कोई नियंत्रण या रोक मरने के पहले इंसान नहीं लगा पा रहा होता है.

उसे अहसास तो हो जाता है तो वो खुश या दुखी हो जाता.

मैंने टोम्बी को देखी वो बड़ा खुश था और सड़क पर ही दौड़ व खेल रहा था सड़क पर ऐसे बैठ रहा था जैसे कि उसे उसकी माँ लेने आ रही है.

मेरे पति भी मरने के पहले फोन से मेरी भाभी से हँस कर बात कर रहे थे.उन्हें जैसे कोई प्रेरणा हुई हो उन्होंने मेरी दीदी को भी फोन लगाने कहा था पर बेटे ने मना कर दिया था. वे प्रसन्न थे उन्हें जाने का अहसास हो गया हो ऐसा स्वस्थ महसूस कर रहे थे. उसी दिन उन्होंने कहा था कि मुझे मेरी पेटी खोलकर सिँह साहब का नंबर देखने दो पर मैंने मना कर दी थी मुझे नहीं मालूम था कि वो आखिरी बार केस की कोई बात एडवोकेट सिँह से करना चाह रहे थे.

इस तरह मरने वाले की जो हरकत होती है कुछ विशेष होती है पर उसके साथ वालों को ऐसा कुछ पता नहीं होता वो गफलत में रहते है और मृत्यु दबे पाँव आकर दबोच लेती है.

कई बार मरने वाले को अपने पुरानी बचपन की यादें जीवंत हो जाती है.मेरे मामाजी मरने के कुछ दिनों पहले अपने बचपन के दिनों में खो गए थे और बार -बार सभी बहनों को बुलाते थे नाम लेकर और कहते थे कि तुम स्कूल नहीं गईं क्या? खाना नहीं खाई क्या?

ऐसी ही बातें वो करते थे जैसे अपने उन्हीं दिनों में जी रहे हो.

मेरी दीदी की सास हमेशा कपड़े लेकर नदी नहाने को जाने की तैयारी करती थी वो अपनी देवरानी को पुकार कर कहती -वच्छला!चल घाटँजी की नदी कपड़े धोने जायेंगे.

जैसे वंही दिन लौट आते थे जो उन्हें बेहद प्रिय थे उन्हीं दिनों में मन पहुंच जाता था तन तो यंही रहता था पर मन वंहा चले जाता जो अति प्रिय समय था.

मृत्यु के पूर्व जीवन के अति प्रिय और कष्टदायक क्षण याद आते है एक रील की तरह जीवन चलायमान होता है मृत्यु शैया पर लेटे व्यक्ति के और उसे ज्यादा तंग न किया जाये यंही बेहतर होगा.

धीरे -धीरे मृत्यु अपने आगोश में ले रही होती है तब उसे सुकून से मरने देना चाहिए कई लोग बेवजह पानी मुख में डालकर उसे परेशान करते है बाधा डालते है ज़ब वो अपने विचारों में तल्लीन होता है उसे मरते वक़्त अपनी अगली यात्रा के सुराग ढूंढने दो वो पदचाप सुनता है कुछ नवीन की.

ये सत्य है कि जो अकस्मात मृत्यु के मुख में चले जाते है उनका शरीर मरता है मन यंही कंही अटक जाता है पर जो दुस्साहस से मृत्यु का वरण करते है वो चले जाते है उसपार.

मैंने टोम्बी को मृत्यु का स्वागत करते देखी जो ऐसे गया मानो कंही नई जगह जा रहा हो.

मैंने बहुत सारी मृत्यु देखी जो पिल्लो की है एक पिल्ले को मै हाथ में उठाकर लाई उसका दिल जोरों से धड़क रहा था. इस तरह से वो ज़ब छूटते ही भागा तो सड़क पर आ रहे किसी बदमिजाज की गाड़ी से टकरा कर मारा गया. मृत्यु जैसे हर वक़्त पीछे थी.

मृत्यु क्यों आती है?

बीमारी और दुर्घटना वश तो मृत्यु होती ही है लेकिन आयु पूरी होने पर भी मृत्यु होती है जो पूर्ण आयु होने पर होती है.

लेकिन कई लोग उम्र होने पर भी स्वस्थ रहते है यदि उनके मन के अनुसार सब होता रहता है. यदि किसी के मन से उसके घर वाले चलते है तो वो व्यक्ति प्रसन्न -चित्त रहकर अपनी आयु पूर्ण करता है.

लेकिन जिसे अपमान किया जाता है गालियां दी जाती है और इग्नोर करते है वो दिल टूट जाने से बेमौत भी मर जाता है. जिसे दुनिया में कुछ भी अच्छा नहीं लगता जो बेमन जीते है वो भी जल्दी मारे जाते है या मर जाते है.

उम्र हो जाने पर भी लोग अच्छा साथ मिले तो जी जाते है बाहर घूमना और अपने ग्रुप में रहना इन सबसे जीवन बढ़ जाता है.

लेकिन यदि अपने बराबर के लोग नहीं मिले चाहने व मानने वाले नहीं हो तो उदासीन होकर इंसान मर जाता है लापरवाही में गिर पड़ जाता है. जिसकी अपने कद्र नहीं करते और बातें सुनाते है मनपसंद खाने नहीं देते है वे लोग मृत्यु का वरण करते है. बेमन से जीना क्या जीना सोचकर लोग मृत्यु को गले लगा लेते है इसलिए हमें अपने साथ वालों के साथ समय बिताना चाहिए उन्हें वक़्त देना, बातें करना और उनके पसंद की चीजें मुहैया कराना चाहिए.

मै ज़ब पति के मृत्यु पर चिंतन करती हूँ तो लगता है उन्हें अच्छा नहीं लगता था कुछ भी इससे भी उन्हें मृत्यु आ गईं. उनका खाना छूट गया था वो अच्छे भजन सुनना चाहते और अख़बार पढ़ना चाहते थे साथ ही मन पसंद राजनीतिक चर्चा भी करना चाहते थे ये सब जिंदगी के लिए जरूरी था जो नहीं हो सका तो धीरे -धीरे वो मरते गये. शरीर मरते गया और वो पूरी तरह से टूट कर जैसे गिरने लगे थे.

मैंने उन्हें बहुत कहा कि आपको घुमाने ले जायेंगे अच्छी होटल में खाएंगे और मंदिर जायेंगे, उनके लिए नये शूट सिलाकर रखें थे पेटी में भरकर लेकिन फिर भी वो चले गये. क्योंकि उनका मन जो था गांव में अपने लोगों के बीच अपनी भाषा में बातचीत करने में था इस तरह से उनका जीवन के प्रति उदासीन होना मृत्यु के निकट उन्हें ले गया.

ज़ब मुंबई के फ्लैट में पहुंचे तो बोले -गांव जैसा तो जीवन नहीं होता गांव में जीने का अलग ही मज़ा है.

और वो अपने गांव तरफ निकल गये क्योंकि वो कंही और नहीं जा पा रहे थे उनका मन बुरी तरह से निराश और टूटा हुआ था कोई भी बात उनमें जीवन का उत्साह नहीं जगा पा रही थी.

यंही होता है तब मृत्यु होती है ज़ब ये अहसास होता है कि हम क्यों जी रहे है? किसके लिए जी रहे है? जीने का मकसद क्या है? क्यों जिये? जीने का कष्ट क्यों उठाये?

मेरे पति को मैंने कही -आप हमारे लिए बेटे के लिए नहीं जियेंगे क्या?

वो कुछ नहीं बोले उनकी ख़ामोशी को मैंने यंही समझी कि वो कह रहे है कि जिवूंगा!

पर जीवन उनके भीतर समाप्त हो गया था जिजीविषा मर गईं थी. आज समाज भी ऐसी ही मौत मर रहा है समाज की जिजीविषा खत्म हो रही है.

शान -शौकत के बाद इंसान फिर जीता नहीं है यदि उसके पास शान से जीने के साधन नहीं हो तो आज के बच्चे हिम्मत हार जाते है और आत्महत्या तक कर लेते है.

गले में फांसी लगाकर मरना ही आत्महत्या नहीं होती जीने की आस छोड़ देना भी आत्महत्या ही तो है.

कितने प्रेम में असफल होकर और फेल हो जाने पर आत्महत्या करते है.

मेरे पति मुझे कई बार धमकी देते थे कि मै मर जाऊंगा क्योंकि वो जानते थे हम उन्हें जिलाये रखना चाहते है उनके सिवाय हमारे पास आय का कोई जरिया भी तो नहीं था. मै परेशान होती थी पर उस दिन आसन्न मृत्यु सन्नीकट थी उनके ऐसा कहते ही मै भी गुस्से से बोली थी कि हाँ!मरना है तो मर जाओ!जी लेंगे हम कैसे भी…

क्या करती गुस्से में मेरे मुख से ये शब्द निकले थे और वो सच में चले गये जैसे मेरे मुंह से यंही सुनना चाह रहे थे कि उनके बिना जीने की हिम्मत है भी कि नहीं.

बस उन्हें लगा होगा कि हम उनके बिना रह लेंगे कैसे भी पूरा कर लेंगे तो वो अपने गांव वालों से मिलने अपने पुरखों के पास चले गये.

मरने के पहले उन्हें अटैक आया शायद मेरी नींद भी रात 2बजे से खुली थी पर उनकी हुँ हूँ की आवाज को मै नार्मल कराह समझी ये नहीं जान सकी कि उन्हें मेरी जरूरत है वो मुझे बुला रहे थे पर मै नहीं समझ सकी. ज़ब पता चला तो उन्हें अटैक आये देरी हो गईं थी उनको ज़ब अस्पताल ले गए तो उनको और अपने आप को संभाल पाना बहुत मुश्किल था.

मृत्यु के पहले आवाज चली गईं फिर किसी तरह से उन्हें मैंने सिर वगैरह सहलाई बिस्तर पर लिटाई तब सर्रा लग गया था आवाज भरर भरर गले से निकल रही थी इसे सर्रा लगना कहते है.

अस्पताल ले जाने ज़ब एम्बुलेंस में डाली तो उनको बहुत कष्ट हुआ क्योंकि वंहा बहुत धक्के लगते है तभी मुख से आवाज निकल रही थी नाक से स्वास बंद होकर मुख से चल रहा था. अस्पताल वालों ने मना किया तो घर लाकर उनको किसी तरह से बिस्तर पर ही पानी पिला कर सहज कर रहे थे थोड़ी चाय और गर्म पानी व दवा दी तो बेबली आवाज अस्पष्ट आवाज जो बिलकुल ही लड़खड़ा रही थी उसमें उनकी घर में सबसे बात कराये. शाम साँवला जी आये तो वो बोले -संझा हो गईं है..

उन्हें बेटे ने उठाया तो उठकर बैठे और बेटे को और मुझे हाथ मिलाकर बहुत आशीर्वाद दिये. बस फिर सो गए थे. रात तीन बार लेटरिंग ले गये तो उनका शरीर बहुत भारी हो गया था. सुबह लेटरिंग ले गये तो उन्होंने पानी मांग कर अपना चेहरा धोये और कुल्ला किये. फिर करवट लेकर सो गये और दिन भर सोये रहे कुछ बोले नहीं. उन्हें होंठ में मै पानी लगा देती तो हाथ से पोंछते थे. दीदी बोली -8दिन भी जीवित रह सकते है तो मै भी गफलत में रह गईं. शाम डायपर बदली तब जाने में थे. रात उनके मामाजी का फोन आया. जिसमें उनके मामा ही बोले वो तो कुछ बोले ही नहीं मुझे नहीं समझा कि वो तो शाम को ही जा चुके थे मामाजी से बात का बहाना था या राह ताक रहे थे.आज का ही दिन था

सावन का सोमवार ज़ब मै रात 9बजे पाँव में घी लगाने लगी तो पाँव ठंडे लगे हाथ देखी तो वो भी ठंडे चेहरा जकड़ा हुआ और मुंह खुला… बस साँवला जी को फोन की तो उन्होंने कहा -पहले पेट देखो.

पेट देखी तो कोई हलचल नहीं थम गईं थी सांसे मै कह रही थी कि आज की रात निकल जाये पर नहीं निकली. पति के प्राण चले गये थे खाली पिंजर पड़ा था. मै रोई भी नहीं सबको बताई खुद को और बेटे को संभालना था. उसी वक़्त साँवला जी आ गये पियूष जी आये डॉक्टर को बुलाया गया. इस तरह तुरंत उसने मृत्यु डिक्लेअर किया.

डॉ ने बताया 4-5घंटे हो चुके है मौत को बॉडी rigid हो चुकी थी हमें बॉडी फ्रीज़र बुलाना पड़ा. दीदी ने बताई वो भाई और पति के साथ आ रही है वे लोग रातों रात निकल पड़े थे.

हमने पति की बॉडी को पलंग से नीचे उतार दिये थे रात 1बजे फ्रीज़र आया तब मै और बेटा ही थे. साँवला जी और पीयूष जी जा चुके थे.

हमने फ्रीज़र में उन्हें रखा उनका चेहरा गोलाकार और तेजयुक्त दिख रहा था उनके मामाजी का 1-2बजे रात को फोन आया उन्हें मैंने तब उनका चेहरा विडिओ से दिखाई. बेचारे अपने भांजे की मृत्यु से हिले हुए थे पर आश्वास्त हुए कि मेरे पति के शव में कोई विकृति नहीं थी. वो पूरी सात्विकता और तेजस्वी तरिके से शवशैया पर लेटे थे. उनके हाथ -पाँव सीधे थे चेहरा विकृत नहीं था सबकुछ बड़ा सहज था कुछ भी विभत्स और भयानक नहीं था.

मेरी छोटी बहन लक्ष्मी मुझे लगातार फोन पर जागने कह रही थी अगरबत्ती और धुप मैंने जाने किस प्रेरणा से ले आई थी. वंही रात भर लगाती रही और सुबह हुई वो कयामत की रात बीत गईं. पति चले गये जाने के पहले बोझिलता थी ऐसा लग रहा था उन्हें हमारी चिंता थी जाना नहीं चाह रहे थे या मृत्यु को मना रहे थे कि अभी मत ले जा. उनके बाद हमारा क्या होगा? इसी चिंता में सोमवार का दिन बीता था और रुकावट आ रही थी बोझिल ऐसा मन कि वक़्त बीत नहीं रहा था.

अब वो जाने को तैयार थे आगामी यात्रा को जैसे हमें देख रहे थे कि हम सब कार्य कर पा रहे है या नहीं. सुबह बहन, जीजाजी और भाई आये. भाई रात भर सफर से बेहद थकान से भरा था उसकी गर्दन तक अकड़ गईं थी.

सभी ने मिलकर और साँवला जी ने मृत्यु सिर्टिफिकेट लाकर हमें बहुत बड़ा सहारा दिये. परदेस में मेरे पति की मृत्यु लिखी थी. वो मेरी बुआ को यंही कहते थे वो पन्ना लाल के घर क्यों गईं मरने?

लेकिन उनके साथ वंही घटा. अपना घर छोड़कर बेचकर उन्हें जाना पड़ा. यंही तो जीवन की कहानी थी जो लिखी गईं. जो हम दूसरों को कहते है वंही हम पर घटता है.

वो चले गये उनकी अंतयेष्टि और घर में अस्थि लाने के बाद बहन, भाई और जीजा भी चले गये. घर में अस्थि थी तो पति मुझे सपने में दिखते रहे कि जा रहे है. बेटे को भी दिखते. हम दोनों एक दूसरे से पूछते और बताते कि दिखे थे क्या कह रहे थे?

दीदी से बताती तो वो कहती -हाँ!कुछ दिन दिखते है. अस्थि विसर्जन समुद्र में करने के बाद भी हम दोनों माँ -बेटा गहरे शोक में डूबे थे. तब मैंने उनका सामान हटा दी कपड़े दान दे दी. लेकिन उनकी थिसिस ज़ब मै दिन भर और रात तक प्रीतिलिपि पर लिखते रही तो रात 11बजे मेरा हाल अजीब हो गया. मुझे अपने आप को संभाल पाना मुश्किल हो गया मुझे लगा मै नियंत्रण खो दूंगी और अजीब आवाज मेरे भीतर से निकलने को होने लगी. तब डरके मारे मै किसी को कुछ नहीं बता सकी बेटे को भी ज्यादा नहीं बताई वरना वो बहुत डर जाता. ऐसा लगने लगा जैसे मेरे भीतर पति की आत्मा आकर उत्पात करना चाह रही मुझे बाहर जाने की इच्छा हुई. ऐसा लगा कि सामने फ्लैट वालों को कुछ बताऊ. लेकिन तभी ये ख्याल आया कि मेरे आजू -बाजु के फ्लैट वाले तो मुझे कुछ बोल ही नहीं रहे पति की मृत्यु में भी उन्होंने एक शब्द नहीं पूछा. तब मै कैसे उन्हें कुछ बता सकती हूँ.

तब मैंने अगरबत्ती और धुप जलाकर हनुमान जी के चालीसा सुनना शुरू की और लगातार 2-3घंटे सुनती रही तो मुझे फिर नींद आ गईं. वो डर की रात हनुमान जी के प्रताप से निकल गईं. अब मैंने उनकी थिसिस को छेड़छाड़ करना बंद कर उसे दान करने का फैसला लिया और उसे निर्मला फाउंडेशन को दान दे दी उनका गलीचा भी दे दी.

वो बेचारे भक्ति और साधना में लीन रहते थे उनके नाम से जाप व पूजन आरम्भ की ताकि उन्हें शांति मिले और इससे उनको शांति भी मिली. पर उनका दिखना चालू रहा. तब जो पूजन हो सकता था वो सब मैंने की.

मेरे पति की आत्मा सुकून से रहे उन्हें शांति का अनुभव हो इसके लिए मैंने निरंतर दान भी किये.

अब पति का क्या अनुभव है मुझे नहीं पता सपने में वो श्वेत पितृ पुरुष के रूप में दिखते है. वो पितृ लोक में है कुत्तों को बीमारी से बचाने लगातार जंहा भी मौका मिलता है दवा पेड़े में दे रही हूँ.

ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें बेटे को जीवन में साथी प्रदान करें और हम दोनों को अच्छे कार्य करने का सामर्थ्य प्रदान करें यंही प्रार्थना और सुमरन है.

जोगेश्वरी सधीर sahu

Jogeshwari sadhir sahu

विरार w मुंबई

Jogeshwarisadhir@gmail.com

@कॉपी राइट 


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