मेरा प्यारा भुरू मेरा dogy नहीं आत्मीय है..

मेरा प्यारा भुरू (डॉगी )

भुरू की तबसे बहुत याद आ रही है जबसे आशीष ने कहा है कि वो बहुत रोता है भुरू को मै बालाघाट मप्र में छोड़ आई हूँ जंहा हमारा घर था पर अब वंहा हमारा घर हमारा नहीं है इस साल मई में बेचकर मै आ गईं और भुरू वंही रह गया. बेचारा मेरे घर के बाहर एक जगह मिट्टी में गोदा बनाकर सोता था तो बाजु वाले ने उसे मारकर भगाया था क्या जमीन भी ये लोग साथ ले जायेंगे?

भुरू के मिलने की भी एक कहानी है तब मै बालाघाट के गांव में थी एक कॉलोनी में वंही हमारा घर है मै वंहा बोर होती थी क्योंकि कोई औरत वंहा मुझसे बोलती नहीं थी भटेरे और पारधी की औरतें मुझे criticize करती थी मेरा मन उदास रहता था. तभी ज़ब गर्मी के बाद बारिश आई थी पहली बौछार के बाद कुत्तों का झुण्ड उधर से गुजरा था मैंने तभी देखा कि सब कुत्ते तो चले गये पर एक सफ़ेद कुत्ता बीमार सा वंही घास में पड़ा था बीमार और सुस्त तभी से मै उसे दवा और खाना देने लगी पहले वो कभी कभी आता फिर हमारे घर तरफ ही रहने लगा. पहले तो हमारे डॉगी टिम्मी ने उसे भोंका और गुरराया फिर दोनों अच्छे दोस्त बन गये. भुरू अब आँगन में आकर बैठता. मेरे पति उसे बड़े प्यार से पुकारते थे… भुरू..

मेरे पति ज़ब भी बाहर शहर से आते तो थक कर वंही गेट पर बैठ जाते थे और भुरू व दूसरे कुत्ते उनके आसपास डोलते रहते क्योंकि पति उनके लिए बिस्कुट और दूध लाते थे.

मै बाजार जाती तो मुझे मंदिर तक छोड़ने आते और मेरे मार्किट से लौटने पर बहुत खुश होकर दौड़ते आते मेरा हाथ नाक से छू देता था भुरू… उन सबके प्यार को आज भी अकेले में याद करती हूँ तो दिल भींग जाता है वे सब बीते लम्हें आँखों के सामने रील की तरह गुजरते जाते है.

ज़ब हमारे 3डॉगी हरिओम नगर वालों के जहर से मर गये तभी मैंने अपना घर बेच दी ज़ब आ रही थी तो भुरू को नहीं मालूम था कि हम उन्हें छोड़ जा रहे है. बेचारा यूँ ही मुझसे मिला था और हमारे आने के बाद वो सब हमारी राह देखते घर तरफ जाते. फिर वंहा से भगा दिए गये तो वो दोनों आशीष की दुकान की तरफ ही बैठने लगे.

मुझे और मेरे पति को बहुत याद आती पर हमारे हालात ठीक नहीं थे मै बेटे संग भुरू और झुंकि की बातें करती पुरानी यादों को ताज़ा करते थे हम लोग.

फिर नागपुर से मुंबई आते हुए मेरे पति को भूखे रहने से अटैक आया और वो मुंबई में बीमार रहकर चल बसे. मुझ पर दुख का पहाड़ टूटा था. पेंशन के लिए ज़ब मै पिछले माह मुंबई से बालाघाट गईं तो वंही गईं अपने बिके घर की तरफ तो भुरू व झुंकि मुझे मिले दोनों सिंधी भैया की दुकान तरफ थे दोनों मेरे हाथ से बिस्कुट खा कर बहुत खुश थे मुझे देखकर उनकी आँखों की चमक बढ़ गईं. दोनों को दूध पीने की याद आ रही थी अगले दिन मै उनके लिए दूध ले गईं दोनों जैसे तृप्ती से भर गये.

तीसरे दिन तो भुरू मस्त था मेरे साथ पुराने घर तरफ से दुकान तरफ लौट आया पर बेचारी झुंकि वंही चौक तरफ बैठ कर इतना भाव -विह्ल होकर मुझसे अपना दुख बयान करने लगी कि मै बहुत दुखी हुई.

अगले दिन विदा लेने गईं भुरू ने पेढ़े खाया पर झुंकि ने कुछ नहीं खाई. मन दुखी था भारी मन से मै लौटी दोनों मुझे मंदिर तक छोड़ने आये और भरे मन से मुझे आते हुए देखते रहे.

मुंबई आकर मैंने आशीष से पूछी तो उसने बताया मेरे आने के बाद 3दिन तक खूब रोये थे.

अब तो झुंकि को कुछ होने वाला है पर भुरू बहुत रोता है उसे मेरी और पापा की याद आती है पर क्या करू यंहा तो मै ही अपने रहने का ठिकाना ढूंढ रही हूँ.

भुरू ये ब्लॉग के माध्यम से कह रही हूँ तुम मत रोओ और झुंकि की तरह अपने दिल को मना लो. मै अब मार्च में आउंगी तब तुम्हें बिस्कुट और दूध दूंगी.

भुरू हमारा साथ आगे भी रहेगा.. देखो!पापा तो तुम्हारे साथ ही रहते है मै भी ख्यालों में जाकर तुम्हें लाढ़ कर लेती हूँ इसका तुम्हें आभास जरूर होता होगा. प्यारे भुरू!दिल छोटा मत करो ये बिछड़ने के दिन है ऊपर वाला हमें चाहेगा तो फिर मिला देगा… भुरू!I will surely meet you never bye!

जोगेश्वरी sadhir @copy right


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