सम्राट पृथ्वीराज चौहान

सम्राट पृथ्वीराज चौहान

सम्राट पृथ्वीराज चौहान

Written by Jogeshwari Sadhir Sahu

भूमिका

हमारे गौरवशाली मध्य -कालीन इतिहास में पृथ्वीराज चौहान का नाम अग्रणी है. यंही एक अंत भी है ज़ब भारत में विदेशी आक्रमणकारी ने पाँव जमाये थे. क्योंकि हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज का अपने समकालीन राजाओं से युद्ध चलते रहा जिसमें किसी तरह से पृथ्वीराज तो विजयी रहें लेकिन भारत हारता चला गया था. यदि पृथ्वीराज ने महोबे के चंदेल राजा से बनाकर रखा होता और आल्हा -ऊदल को खत्म नहीं करते तो शायद मोहम्मद गोरी कभी नहीं जीत पाता. लेकिन शायद तो शायद ही है जो कुछ गुजरा इतिहास में वो दारुण था भीषण और देश ने उसकी क़ीमत चुकाई. आगे आने वाला रक्तरंजीत इतिहास इसकी गवाही है तो आईये शुरू करते है आखिरी चक्रवर्ती सम्राट पृथ्वीराज चौहान की गाथा क्योंकि आल्हा -ऊदल के साथ उन्हीं की भिड़ंत होती रही थी.

पृथ्वीराज के राज का आरम्भ

जिस समय पृथ्वीराज का जन्म हुआ उस वक़्त अनंगपाल दिल्ली, कन्नौज में अजयपाल, जोधपुर में नाहरराय, चित्तोड़ में अमरसिंह, पाटन में भीमदेव, जैसलमेर में भोजदेव, आबू में जैतपवाँर, अजमेर में सोमेश्वर राज कर रहें थे.

कवि चंद के अनुसार राजा अनंगपाल का कामध्वज के साथ युद्ध हुआ तब अजमेर के राजा सोमेश्वर ने अनंगपाल की सहायता की जिससे प्रसन्न होकर अनंगपाल ने अपनी छोटी कन्या कमला देवी का विवाह सोमेश्वर से करा दिया.

इसी कमला या इंद्रकुंवरी ने पृथ्वीराज को वि. संवत 1115 में जन्म दिया था. कई तरह की कीवदन्ति है कि पृथ्वीराज की माता को उनके पिता ने जंगल भेज दिया था आदि.

कहा जाता है जंगल में ही इंद्रकुंवरी ने पृथ्वीराज को अश्वस्थामा ऋषि के आश्रम में जन्म हुआ वंही लालन -पालन व शस्त्र -विद्या भी हुई.

बाद में बालक पृथ्वीराज को पिता सोमेश्वर आश्रम से अपने राज्य अजमेर में ले आये. वंहा आने से पूर्व विदा करते समय ऋषि अश्वस्थामा ने एक अर्धचंद्राकर बाण पृथ्वीराज को देकर आशीर्वाद देते हुए कहा कि ये बाण खाली नहीं जायेगा और तुम शब्दभेदी बाण मारने में प्रसिद्धि पाओगे.

पृथ्वीराज के 12वर्ष की अल्पायु में ही उनके पिता उन्हें अपने छोटे भाई कान्हदेव को सौंप कर स्वर्ग सिधार गए. कुछ दिन बाद महाराज नाहु भी पुत्र शोक से परलोकगामी हुए और अजमेर पर पृथ्वीराज अनेक शूरवीर सामंतों के सहित राज्य करने लगे.

पृथ्वीराज को योद्धा कहा गया है क्योंकि उनमें कई हाथियों का बल था और अकेले ही अनेकों वीरों से लड़ कर जीतते रहें.

पृथ्वीराज का दिल्ली पर राज करना

पृथ्वीराज दिल्ली कैसे आये इस बारे में कहा जाता है कि दिल्ली के राजा अनंगपाल के पास पश्चिम के गजनी के सुल्तान शहाबुद्दीन गोरी ने दिल्ली पर चढ़ाई कर दूत भेज कर कहला भेजा कि गजनी का बादशाह आया है और अटक नदी पर पड़ाव डाला है तब ये समाचार सुनकर अनंगपाल ने अपने मंत्रियों से मशवरा किया कि अब क्या करें कैसे रक्षा करें राज्य की?

तब मंत्रियों ने कहा -दिल्ली में तो कोई इस योग्य नहीं जो सुल्तान का सामना कर सके किन्तु आपकी पुत्री इंद्रकुंवरी का पुत्र पृथ्वीराज में वो सामर्थ्य है कि वो दिल्ली को बचा सकेंगे. उसे बुलाकर राज्य की रक्षा की जिम्मेदारी दीजिये.

तब अनंगपाल के बुलावे पर पृथ्वीराज ने शूरवीर कवि चंद और अपनी सेना लेकर आदी भयंकर हाथी पर सवार होकर दिल्ली आकर अपने नाना अनंगपाल को प्रणाम किया.

तब अनंगपाल ने पृथ्वीराज को गले से लगाकर कहा कि अफगानिस्तान से गजनी का सुल्तान दिल्ली पर चढ़ आया है हम उससे युद्ध करने जायेंगे तब तक दिल्ली की रक्षा का भार तुम्हें सौंपते है. तब पृथ्वीराज ने कहा कि मै ऐसे ही राज्य की जिम्मेदारी नहीं ले सकता. आप सबके सामने मुझे राज्य का अधिकारी कीजिये और ये भी कहिये कि मै लौटकर भी आऊं तो बिना पृथ्वीराज की आज्ञा के नहीं आऊं.

तब अनंगपाल ने अपने मंत्रियों और कुटुंबियों को बुलाकर कहा कि हम अटक पर सुल्तान से युद्ध करने जा रहें और राज्य तथा कोष आदि सब पृथ्वीराज के अधीन करते है. और अनंगपाल युद्ध करने चले गए.

तब उनके जाने के बाद पृथ्वीराज ने उनकी बची सेना और सामंतो को रत्न -वस्त्र आदि देकर अपनी तरफ कर लिया और अपने रिश्तेदारों को दिल्ली बुलाकर बसा लिया. वंही अजमेर गढ़ की रक्षा हेतु अपनी पूर्व सेना को रख दिया.

इस प्रकार ज़ब दिल्ली के राज्यधिकारी बने तब पृथ्वीराज की आयु मात्र 16वर्ष थी. उसी वक़्त दिल्ली में चामुंड राय ब्राह्मण पृथ्वीराज से आकर मिला और उनकी सेना में सेनापति बना जो चौड़ा ब्राह्मण के नाम से विख्यात हुआ.

समकालीन कनौज राजा जयचंद

दिल्ली के राजा अनंगपाल की बड़ी पुत्री सुंदरी का विवाह कन्नौज के राजा विजयपाल से हुआ था जिसके द्वारा उनके जयचंद का जन्म हुआ.

आखिर में अनंगपाल महाराज का जी इस संसार से उचट गया और वो बद्रीकाश्रम में जाकर तपस्या करने लगे और उन्होंने दत्तक पुत्र लेने का विचार किया.

सभी का मानना था कि राजा अनंगपाल जयचंद को दत्तक बनाएंगे किन्तु उन्होंने अपना राज्य पृथ्वीराज को सौंपा तो जयचंद को ईर्ष्या हुई तभी से वो पृथ्वीराज से बैर रखने लगे और उनकी दुश्मनी का खामियाजा अंततः सारे देश को भुगतना पड़ा जिसके दूरगामी बहुत ही दुःखद परिणाम हुए.

हिंदुस्तान के मुस्लिम शासकों के हाथों में चले जाने का यह भी एक मुख्य कारण था क्योंकि ज़ब दो बड़े शूरवीर आपस की दुश्मनी से बंटे रहें तो विदेशी आक्रमणकारी ने देश को आसानी से जीता और गांव -गाँव, शहर -शहर में मार -काट मचाते रहें लोगों के कत्ल किये गए बच्चों को गुलाम बनाया गया और औरतों की इज्जत लूट कर उन्हें गजनी के बाजार में बेच दिया गया.

पृथ्वीराज के विवाह संबंध

पृथ्वीराज ने कई विवाह किये थे. गुजरात के भोलाराम नामक अहंकारी राजा को पराजित करके उसकी कन्या इच्छन कुमारी से विवाह किया. फिर चंद्रपुन्दर की दाहिनी नामक कन्या से विवाह किया. बाद में दिल्ली से पूर्व दिशा में समुद्र शिखर नामक एक नगर था उसके यादव वंशी राजा विजय पाल का पुत्र पदह्म सेन की कन्या पदमावती ने पृथ्वीराज को पत्र भेजा था क्योंकि उसका विवाह कुमाऊ के राजा से होना तय हुआ था. पदमावती का पत्र पाकर पृथ्वीराज ने छोटी सी सेना के साथ समुद्र शिखर पर चढ़ाई की और वंहा के राजा कमोदमनी को परास्त कर पदमा को ब्याह कर दिल्ली ले आया.

फिर उरई के राजा माहिल की बहन अगमा से भी पृथ्वीराज ने विवाह किया. अगमा बड़ी बुद्धिमती थी और समस्त रानियों में वंही पटरानी मानी जाती थी. इसी से बेला नामक कन्या का जन्म हुआ जो कि बाद में महोबे और दिल्ली की लड़ाई और दोनों राज्य के योद्धाओ के विनाश का कारण बनी जिससे बाद में शहाबुद्दीन गोरी की विजय आसान हो गईं.

इसी बीच देवगिरी के राजा की कन्या शशिव्रता को पाने को जयचंद देवगिरी गए तो बीच में दिल्ली से आकर पृथ्वीराज ने उसका हरण कर लिया जिससे पृथ्वीराज और कनौज के जयचंद का युद्ध हुआ किन्तु जयचंद को हार कर लौटना पड़ा. इससे जयचंद के मन में पृथ्वीराज के प्रति वैमनस्य बढ़ता गया. क्योंकि पृथ्वीराज जो थे वो लगातार ऐसे काम कर रहें थे जो जयचंद को चोट पहुंचा रहे थे. जयचंद अब एक चोटिल नाग की तरह पृथ्वीराज पर फून्फकार रहें थे.

इसके बाद आग में घी का काम किया था पृथ्वीराज ने ज़ब जयचंद की ही कन्या संयोगिता को स्वयंबर -मंडप से जबरदस्ती उठा लाया था क्योंकि संयोगिता ने उसे पत्र भेजकर बुलाया था और जयचंद ने पृथ्वीराज को अपमानित करने उसकी मूर्ति स्वयंबर-मंडप के द्वार पर द्वारपाल की जगह लगा रखा था. वंही जाकर संयोगिता ने उसी मूर्ति को जयमाला पहनाई थी और तब पृथ्वीराज ने संयोगिता को सारे राजाओं के बीच से उठा लाया था उसके सेना के कुछ योद्धा जयचंद की पीछा करती सेना से लड़े थे लेकिन पृथ्वीराज को संयोगिता के हरण में सफलता मिली थी. तभी उसने दिल्ली जाकर संयोगिता से विवाह किया था.

बाद में इसी संयोगिता की सुंदरता पर आसक्ति में पड़े और राज्य से ग़ाफ़िल लापरवाह पृथ्वीराज को हराने के लिए जयचंद ने अपने अपमान का बदला लेने के लिए शहाबुद्दीन गोरी को बुलवाया था और आखिरी युद्ध में पृथ्वीराज की पराजय हुई थी. उसे बंदी बनाकर और अपने उत्तराधिकारी को दिल्ली पर राज्य सौंप कर शहाबुद्दीन गजनी लौटा था और लौटते हुए उसने कनौज पर भी आक्रमण करके जयचंद को हरा दिया था इस तरह सबक दे गया था शहाबुद्दीन कि जयचंद ने एक विदेशी मुस्लिम सुल्तान पर भरोसा करके देश और अपने से ही आत्म -घात किया था.

बाद me दिल्ली में लूटपाट मची थी सुल्तान की सेना ने कहते है दिल्ली को लूटा था संयोगिता का क्या हुआ नहीं मालूम कुछ कहते है उसने सभी रानियों सहित जौहर कर लिया था और पृथ्वीराज के गले में तख्त डाल कर उसे जंजीरों से बांधकर पाँव में कड़े डालकर पैदल चलाते हुए सुल्तान गजनी ले गया जंहा उसे बंदीगृह में कैद रखा गया और प्रताड़ित किया गया.

कहते है पृथ्वीराज ज़ब कैद में था तो उसे देखने के लिए ज़ब सुल्तान आया तो आग्नेय नेत्रों से पृथ्वीराज ने शहाबुद्दीन को देखा इससे नाराज होकर सुल्तान ने अपने जल्लाद से पृथ्वीराज की ऑंखें निकलवा दी थी.

कहने को बहुत सी कहानियां है पर पृथ्वीराज का अंत वंही की जेल में परदेस में पराये मुल्क में अपने कार्यों पर मंथन करते हुआ था तब पृथ्वीराज को अपनी गलतियां भी याद आई होंगी कैसे उन्होंने घमंड और सत्ता के नशे में चूर होकर देश के बड़े -बड़े राजाओं से शत्रुता मोल ली और अनेकों को मार दिया जिसमें महोबे के कई वीर योद्धा भी थे.

इसका दुष्परिणाम ये हुआ कि ज़ब शहाबुद्दीन चढ़ कर आया तो पृथ्वीराज को बचाने और मदद करने वाले शक्तिशाली राजा या तो मारे जा चुके थे या पृथ्वीराज के अहंकारी बर्ताव से नाराज थे इसके चलते उसे देश के योद्धाओ का साथ नहीं मिल सका. हालांकि बहुत सारी सेना लड़ने को आई थी पर पृथ्वीराज को हार का मुख देखना पड़ा. तीर लग जाने से हमेशा जीतने वाला पृथ्वीराज ज़ब युद्ध -भूमि से घोड़े पर सवार होकर भागने लगा तो उसे शहाबुद्दीन के सैनिकों ने पकड़कर सुल्तान की आज्ञा से बंदी बना लिया और फिर देश में जो आक्रमणकारी हुकूमत क़ायम हुई उसने देश के स्वाभिमान को पाँव तले कुचला. तलवार के बल पर लाखों लोग हिन्दू से मुसलमान बनाये गए. ये सब बहुत ही त्रासदीपूर्ण था और उसके कई सदियों तक जिहाद के चक्र में देश उलझता चला गया. हिन्दू धर्म वालों का मानसिक, आर्थिक और शरारीक शोषण हुआ और वो समझौतावादी होते गए उनका मनोबल गिरने लगा. इससे हिंदू धर्म में कई कुरुतियों का प्रादुर्भाव हुआ.

लेखिका -जोगेश्वरी सधीर साहू

Copyright @jogeshwari sadhir sahu

2/1/23


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