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दिवाली ज़ब भी आती है मुझे बुआ जी के घर बिताये दिवाली के त्यौहार बरबस याद आते है. इतने बरस बीत जाने पर भी वो स्मृति जैसे ताज़ा ही है.

स्मृति

दिवाली ज़ब भी आती है मुझे बुआ जी के घर बिताये दिवाली के त्यौहार बरबस याद आते है. इतने बरस बीत जाने पर भी वो स्मृति जैसे ताज़ा ही है.

तब नवदुर्गा से ही जैसे दिवाली का आगाज हो जाता था. और हम दिवाली की छुट्टी की प्रतीक्षा करते थे.

तब कुंवार का मौसम बहुत सुहाना हो जाता था. ऐसे तूफान नहीं आते होंगे. पर कभी वर्षा होती थी.

फ़सल आ चुकी होती थी और हमारे खाने के लिए सीताफल व सिंघाड़े की सौगात मौसम लाता था. जाम तो खैर कोई गिनती में ही नहीं थी.

हम सब बच्चे एक साथ बाजार जाते. वो गांव का हाट होता था. गांव में रोजाना गुजरी भी लगती थी. शाम का समय हाट या गुजरी और मेलजोल का होता था.

यंही नहीं दिवाली के पहले से घर -बाहर की साफ -सफाई और पुताई का काम भी चलता. खेती -बाड़ी का काम भी होता रहता.

घर के अलावा आंगन भी गोबर व चूने से पोते जाते थे. ज्यादातर छुई से पुताई करते थे आंगन व घर के किनारे में.

फिर घर के दरवाजों को भीगे कपड़े से पोंछ कर काले तेल -रोंगन से रंगा जाता जिससे कपड़े काले होने का भय हमेशा बना रहता था. तब ऐसे कलर -पेंट नहीं आये थे. डिस्टेंम्पर भी कराना बड़े लोगों की बात होती थी. चूने में रंग मिला कर भी पुताई कर लेते थे.

दिवाली के दिन अंतिम बार साफ -सफाई होती. पूरा घर लीपा जाता. लकड़ी के बक्से व पटिये धोये जाते थे. फिर दियों के लिए कमची बाँधी जाती. केले के पत्तों से द्वार सजाये जाते. शाम को दीयों की पंक्तियों की जगमग से अमावस्या की रात में समा बंध जाता था.

बुआ जी के घर मै नौकरों के साथ फटाके लाने जाती थी. रात गेंदु भाऊ आते. शुभ -लाभ लिखते. घर के बही -खातों पर भी लिखा जाता. सफ़ेद चादर बिछाई जाती जिसपर हम सब बैठते. बुआ जी के यंहा तिजोरी में भी शुभ -लाभ लिखकर बहुत सारे चिल्लर एक बड़ी पीतल की प्लेट में रखे जाते.

फिर पूजन कर फटाके चलाये जाते. लक्ष्मी जी की आरती गाई जाती और सभी को प्रसाद देकर बाद में  भोजन भी कराया जाता था. जिसमें कई पकवान बुआ जी बनाकर परोसती थी.

वो एक सम्पन्न समय था. बुआ के घर समृद्धि थी. अगले दिन गोवर्धन पूजन होता और छोटी दिवाली मनाते. तेल के पकवान बड़े -पूड़ी बनाये जाते.

मिठाई व प्रसाद का आदान -प्रदान होता. तब इतनी तामझाम नहीं होती थी पर दिल खुशियों से लबालब भरे होते थे.

मै अपनी सहेली ममता के साथ मिलकर खेलती और हमारे जीवन में त्यौहार भी खेल की तरह ही आता था. वंही दिवाली की याद मुझे हर बरस आती है. और बुआ जी का स्नेह मन को भिगो देता है.

लेखिका -जोगेश्वरी सधीर

व्हाट्सप्प 8109978163

(रचना मौलिक व स्वरचित है तथा कॉपी राइट के अधीन प्रकाशन हेतु प्रेषित है )


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